सुबह के छह बजे हैं। कर्नाटक के एक जिले मंड्या के कस्बे, श्री रंगापटनम में, रमेश अपनी छोटे-से जनरल स्टोर का पुराना शटर उठाते हैं। दुकान बहुत साधारण है, लकड़ी की दो अलमारियां, तराज़ू, टॉफियों के जार, दाल-चावल की बोरियां। बरसों तक उनकी ज़िंदगी उधार की कॉपी और खुले पैसों के हिसाब से चलती रही। न कोई बड़ा वाक़या, न कोई बड़ा सपना। लेकिन, पिछले दस–बारह सालों में कुछ बदला है। बिना शोर, बिना नारे। बस रोज़मर्रा की ज़िंदगी में।
रमेश कोई नीति-विशेषज्ञ नहीं हैं। उन्होंने कभी सरकारी रिपोर्ट नहीं पढ़ी। लेकिन, उन्हें इतना ज़रूर पता है कि जब ज़िंदगी थोड़ी आसान हो जाए, थोड़ी सुरक्षित लगे, तो समझ लीजिए कुछ ठीक हुआ है। उनकी पत्नी सुनीता को वह दिन आज भी याद हैं, जब उनके गांव में सुबह अंधेरे में खेतों की ओर जाना मजबूरी थी। फिर शौचालय बना, स्वच्छ भारत के तहत। “ये सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं थे,” सुनीता कहती हैं, “ये हमारी इज़्ज़त (सम्मान) थी।” अब बेटियों को अंधेरे का इंतज़ार नहीं करना पड़ता है। बीमारी कम हुई है। आत्मविश्वास बढ़ा है। जो टीवी पर सरकारी योजना लगती थी, वे घर में सुकून बनकर आईं हैं।
Read in English: How the winds of change reached a small shop…
उसी साल सुनीता के नाम से जनधन योजना में बैंक खाता खुला। पहली बार पासबुक हाथ में आई तो आंखों में चमक थी। सब्सिडी सीधे खाते में आने लगी। बिचौलियों का खेल खत्म हुआ। बैंक अब अमीरों की जगह नहीं रहा बल्कि घर का हिस्सा बन गया। रमेश, जो कभी बैंक से डरते थे, आज एटीएम को मंदिर की घंटी जितना जाना-पहचाना मानते हैं।
बेटी पूजा की परवरिश अलग माहौल में हुई। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ उनके लिए सिर्फ पोस्टर नहीं था। मतलब था, स्कूल पूरा करना। फ्री सरकारी बस सेवा से स्थानीय महिलाओं की जिंदगी बदल रही है। मुफ्त में घूमना, काम के लिए शहर आना, लड़कियों को खूब भा रहा है। स्त्री आजादी, सच में! आज पूजा नर्स बनने की ट्रेनिंग ले रही है। जब रमेश अचानक बीमार पड़े, तो आयुष्मान भारत योजना ने अस्पताल का खर्च उठाया। पांच लाख रुपये की तक सुरक्षा, जो पहले ज़मीन बेचने या क़र्ज़ लेने की वजह होती थी। डिजिटल इंडिया चुपचाप दुकान में दाख़िल हुआ। काउंटर के पास एक क्यूआर कोड टंगा है। ग्राहक मोबाइल से पेमेंट करते हैं। पैसा तुरंत खाते में आ जाता है।
नोटबंदी और कोरोना के दिनों में यही डिजिटल भुगतान दुकान को बचा गया। रमेश हंसते हुए कहते हैं, “पहले मशीन से डर लगता था। अब मेरी अम्मा भी बैलेंस चेक कर लेती हैं।” उज्ज्वला योजना से रसोई का धुआं खत्म हुआ। चूल्हे की कालिख दीवारों से ही नहीं बल्कि फेफड़ों से भी हट गई। सुनीता के पास अब वक़्त है, दुकान में मदद करने का, सिलाई करने का। साफ़ ईंधन उनके लिए पर्यावरण नहीं बल्कि सांस लेने की राहत है।
जीएसटी आने पर रमेश परेशान हुए। बिल, टैक्स, हिसाब, सब नया था। लेकिन, धीरे-धीरे व्यवस्था साफ़ हुई। एक टैक्स, कम झंझट। व्यापार ज़्यादा सलीके वाला हुआ। मुद्रा योजना से बिना गारंटी का छोटा क़र्ज़ मिला। दुकान में फ्रिज आया, सामान बढ़ा। पहली बार रमेश ने सिर्फ गुज़ारे के बारे में नहीं सोचा, आगे बढ़ने का हौसला आया। नौकरी ढूंढने की जगह रोज़गार पैदा करने का जज़्बा जगा।
प्रधानमंत्री आवास योजना से पक्का घर मिला। कच्ची दीवारों की जगह मज़बूत छत मिली। अब घर अस्थायी नहीं, अपना है। सिर ऊंचा हुआ। सबसे छोटा बेटा स्वामी नए दौर की पढ़ाई देख रहा है। नई शिक्षा नीति के तहत पढ़ाई सिर्फ रट्टा नहीं, बल्कि कौशल भी है। ‘स्वयं’ जैसे ऑनलाइन कोर्स, वोकेशनल ट्रेनिंग, ये बातें रमेश के बचपन में सपना भी नहीं थीं। आज ये सामान्य हैं। यह सच है कि सब कुछ ‘परफेक्ट’ नहीं है। महंगाई चुभती है। नौकरियों की कमी है। दफ़्तरों में चक्कर अभी भी लगते हैं। लेकिन, दिशा साफ़ दिखती है, एक छोटी दुकान से भी। सबसे बड़ा बदलाव सोच में आया है। सफाई अब सरकार का नहीं बल्कि सबका काम है। बेटियां बोझ नहीं बल्कि ताक़त हैं। तकनीक डर नहीं बल्कि सहारा है। गरीब अदृश्य नहीं बल्कि हक़दार हैं।
रमेश कभी ‘विकसित भारत 2047’ पर भाषण नहीं देंगे। लेकिन, हर सुबह जब वह क्यूआर कोड से पेमेंट लेते हैं, बेटी को नर्सिंग कॉलेज जाते देखते हैं, और बिना धुएं वाली रसोई में चाय बनती है, तो उन्हें अहसास होता है कि बदलाव की हवा उनके मोहल्ले को मात्र छूकर नहीं गई बल्कि वह अंदर आई, ज़िंदगी बदली, और पीछे छोड़ गई, उम्मीद, जो अनुभव से पैदा हुई है। और शायद, असली बदलाव की पहचान यही है।






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