झरना गरज रहा था। नाव झूम रही थी। और, तभी एक सीढ़ी ने हमारे घुटनों के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया! हम स्विट्ज़रलैंड के शाफहाउज़ेन के पास शानदार राइन फॉल्स देखने आए थे। सोचा था शांतिपूर्ण नाव की सैर होगी। लेकिन, देखते-देखते यह सफर रोमांच, सीढ़ियों की चढ़ाई, यातायात की उलझन और आखिर में बचाव अभियान में बदल गया। और इस पूरे अभियान में हमारे साथ थीं, लेडी मार्था, चाय और समोसे!
हमारी नाव राइन फॉल्स की ओर बढ़ी। जैसे-जैसे हम विशाल जलप्रपात के करीब पहुंचे, पानी की गर्जना बढ़ती गई। ऐसा लगा जैसे नदी खुद पुकार रही हो, “आओ बहादुर इंसानों! मुफ्त फेसियल और थोड़ा-सा दिल का व्यायाम आपका इंतज़ार कर रहा है!” और प्रकृति ने अपना वादा निभाया।
पानी की महीन बूंदें हवा में तैरती हुई हमारे चेहरों पर पड़ीं। लगा कि जैसे ‘मदर नेचर’ खुद दुआएं दे रही हो। न कोई टिकट, न अपॉइंटमेंट और न पानी का प्रेशर कम-ज्यादा करने की गुंजाइश! राइन फॉल्स का नज़ारा वाकई दिलकश था। चट्टानों पर पूरी ताकत से गिरता सफेद पानी, चारों तरफ हरियाली और नीचे नीला-सा पानी, नज़ारा रोमांचक भी था और सुकून देने वाला भी। हमारे कप्तान साहब भी पूरे जोश में थे। उन्होंने हमें झरने के आसपास लगभग तीन चक्कर लगवाए। हम खूब खुश हुए। हमें क्या मालूम था कि असली इम्तिहान अभी बाकी है।
नाव हमें एक जगह उतारकर चली गई। हमने सोचा, अब आसानी से रेलवे प्लेटफॉर्म और फिर अपनी बस तक पहुंच जाएंगे। लेकिन, सामने एक खड़ी सीढ़ी खड़ी थी। ऐसी सीढ़ी, जिसे देखकर लगा कि इसे किसी शरारती पर्यटन अधिकारी ने बनाया होगा, जिसे बुज़ुर्ग यात्रियों के घुटनों से खास दुश्मनी हो।
फेरी जा चुकी थी। रास्ता कुछ साफ नहीं था। और सीढ़ियां ऊपर ऐसे जा रही थीं जैसे स्विट्ज़रलैंड का अपना एवरेस्ट हो। हमने सीढ़ियों को देखा। सीढ़ियों ने हमें देखा। दोनों पक्ष समझौते के लिए तैयार नहीं थे। “क्या रेलवे प्लेटफॉर्म ऊपर है?” “बस कहां है?” “अगली फेरी कब है?” “किसी ने मेरे घुटनों का आपातकालीन नंबर देखा है?”
चढ़ाई शुरू हुई। एक सीढ़ी। ठहरो। सांस लो। दूसरी सीढ़ी। रेलिंग खोजो। कुछ और सीढ़ियां। अब बेंच, चमत्कार या हेलीकॉप्टर, कुछ भी चलेगा! हमारे घुटनों ने विरोध शुरू कर दिया। फेफड़ों ने बातचीत की। पैरों ने बाकायदा समझौता-पत्र पेश कर दिया, “यह सब ब्रोशर में नहीं लिखा था!”
यह एवरेस्ट नहीं था, मगर दिनभर घूमने के बाद हमें ऐसा ही महसूस हो रहा था। राइन फॉल्स ने नाव की सैर कराई थी। सीढ़ियां अब हमें आध्यात्मिक यात्रा पर ले जा रही थीं! ऊपर पहुंचकर भी राहत नहीं मिली। अब सवाल था कि पानी पार करके अपनी बस तक कैसे पहुंचा जाए।
फेरी जा चुकी थी और रास्ता स्पष्ट नहीं था। हल्की-सी अफरातफरी शुरू हुई। सवाल उठे कि किसने क्या समझा? किसने क्या नहीं समझा? किसे लगा कि फेरी हमारा इंतज़ार करेगी, जैसे कोई शरीफ स्विस घड़ी? गुस्सा कम था, हैरानी ज़्यादा। तभी लेडी मार्था मैदान में उतरीं। हमेशा की तरह शांत और मुस्तैद, उन्होंने तुरंत दूसरी नाव का इंतज़ाम कर दिया। जान में जान आई। लेकिन, एक पेंच था। हमें जल्दी करना था। और फिर शुरू हुई दिन की दूसरी खेल प्रतियोगिता।
हम सीढ़ियों से नीचे भागे। हाथों में सामान, चेहरों पर चिंता और सांसों में कमी। कुछ मिनट पहले हम झरने की खूबसूरती देख रहे थे। अब बचाव नाव की तरफ ऐसे दौड़ रहे थे जैसे ओलंपिक की वरिष्ठ नागरिक स्पर्धा शुरू हो गई हो। “जल्दी!” “संभलकर!” “नाव मत छूटने देना!” और किसी ने शायद कहा, “कोई मेरी इज़्ज़त पकड़ लो, तीन सीढ़ियां नीचे गिर गई है!” माहौल गंभीर भी था और बेहद मज़ेदार भी। हम स्विट्ज़रलैंड घूमने आए थे, इबुप्रोफेन प्रायोजित सीढ़ी प्रतियोगिता में हिस्सा लेने नहीं!
खैर, मार्था का इंतज़ाम काम आया। हम नाव से पार पहुंचे और आखिरकार बस तक पहुंच गए। दिल शांत हुआ। सांस सामान्य हुई। शरीर ने भी फिलहाल युद्धविराम घोषित कर दिया। बाद में, मार्था ने बताया कि पूरी उलझन गलतफहमी के कारण हुई थी। बात समझ में आई तो तनाव भी कम हुआ।
इतनी मशक्कत के बाद हमें किसी भाषण या प्रेरक संदेश की जरूरत नहीं थी। हमें चाहिए थी चाय! एक बिस्ट्रो में मसाला चाय और समोसे मिले। कई दिनों से यूरोपीय भोजन का लुत्फ उठाने के बाद चाय-समोसे ने जैसे घर वापसी करा दी।
सच पूछिए तो एक अच्छी कप चाय बहस खत्म कर सकती है, थके मुसाफिर को जगा सकती है और भविष्य पर फिर से भरोसा पैदा कर सकती है। राइन फॉल्स ने रोमांच दिया था। चाय ने भावनात्मक मरहम लगा दिया।
होटल लौटते समय मार्था ने एक और खूबसूरत सरप्राइज़ दिया। उन्होंने पूरे समूह के लिए एक भारतीय रेस्तरां में रात के खाने का इंतज़ाम किया। मेज़ देखते ही लगा जैसे छोटा-सा हिंदुस्तानी त्योहार शुरू हो गया हो। पानीपुरी, पिज़्ज़ा, चावल, सांभर, रसम, आइसक्रीम, वाइन और बीयर, सब अपनी-अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे थे।
पानीपुरी ने वही परिचित खट्टा-तीखा धमाका किया। सांभर और रसम ने पेट और दिल दोनों को सुकून दिया। चावल ने वह भरोसेमंद आधार दिया, जिस पर सभ्यता टिकी हुई है। और पिज़्ज़ा? उसने तो हमारे अंतर्राष्ट्रीय खाने में स्थायी वीज़ा हासिल कर लिया है!
हमारी स्वादेंद्रियां ऐसे जागीं जैसे शादी में कोई अचानक कह दे, “बुफे खुल गया है!” दिनभर की थकान, सीढ़ियों की मशक्कत और फेरी की अफरातफरी के बाद यह दावत किसी इनाम से कम नहीं थी। मार्था की दरियादिली ने थकाऊ दिन को यादगार शाम में बदल दिया।
ब्लैक फॉरेस्ट से राइन फॉल्स तक का सफर सिर्फ खूबसूरत नज़ारों का सफर नहीं था। इसमें हरियाली, ताज़ी हवा, गरजता झरना और प्रकृति की ताकत के बेहद करीब जाने का मौका मिला। लेकिन, साथ में मिली एक अनपेक्षित सीढ़ी यात्रा, थोड़ी अफरातफरी, एक बचाव नाव और साफ संवाद की अहमियत का सबक।
सफर हमेशा तय कार्यक्रम के मुताबिक नहीं चलता है। कभी फेरी निकल जाती है, रास्ता गड़बड़ा जाता है और बस तक पहुंचने का छोटा रास्ता एवरेस्ट जैसा लगने लगता है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां नज़ारा शानदार होता है और घुटने बेचारे! लेकिन, यही अनपेक्षित लम्हे बाद में सबसे अच्छी कहानियां बनते हैं। हम राइन फॉल्स देखने आए थे। लौटे तो साथ में झरने की गर्जना, पानी की फुहार, थके हुए पैर और ढेर सारी हंसी थी।
अच्छा टूर गाइड आपको खूबसूरत जगहों तक ले जाता है। महान गाइड मुसीबत में नाव भी मंगाता है और बाद में पानीपुरी भी खिलाता है! मार्था, आपकी नाव, आपकी मेहरबानी और शानदार दावत के लिए शुक्रिया। आपने याद दिलाया कि जब सफर की योजना गड़बड़ा जाए, तो सब्र, दोस्ती और एक प्याली चाय सफर को फिर पटरी पर ला सकती है।
हमने राइन फॉल्स देख लिया। सीढ़ियों से भी एक सम्मानजनक मुकाबला कर लिया। नाव पार कर ली। चाय, समोसे और भारतीय दावत से जश्न भी मना लिया। अब एक बुज़ुर्ग मुसाफिर और क्या मांगे?

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