काफी समय तक बुद्धिलब्धि, यानी आईक्यू, का स्कोर पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ता रहा है। इस प्रवृत्ति को 'फ्लिन प्रभाव' कहा जाता है। लेकिन, हाल के वर्षों में शोधकर्ताओं ने कुछ अलग ही रंग देखा है। नई पीढ़ियां, खासकर जेन-जी, उसी उम्र में मिलेनियल और बूमर्स की तुलना में कम अंक ला रही हैं। क्यों?
इसका कारण कोई एक नहीं है, बल्कि जीवनशैली, शिक्षा और वातावरण में आए बदलावों का मिश्रण है। आज के बच्चे टीवी, मोबाइल, टैबलेट और कई तरह-तरह की स्क्रीन से घिरे हुए बड़े होते हैं। लगातार छोटे-छोटे कंटेंट का धाराप्रवाह, जैसे स्क्रॉल करना, स्वाइप करना और मल्टीटास्किंग, दिमाग को गति के लिए तो प्रशिक्षित करता है, लेकिन आवश्यक गहराई के लिए नहीं। लंबे लेख पढ़ना, जटिल समस्याएं हल करना या अमूर्त विचारों पर बैठकर सोचने की आदत अब कम होती जा रही है, और यही वे कौशल हैं जिन्हें आईक्यू टेस्ट मापते हैं। इसके साथ ही, भारत सहित कई देशों में गणित और पढ़ने की दक्षता में लगातार गिरावट आई है। इससे भी ये स्कोर लगातार नीचे जाने लगे हैं।
Read in Hindi: Changing curve of intelligence, Why Gen Z’s IQ is declining...
कुछ हद तक डिजिटल आदतों के कारण, और कुछ हद तक शिक्षा के बदलते स्वरूप के कारण ध्यान केंद्रित करने की क्षमता भी कम हो गई है। स्कूल अब तकनीक पर ज्यादा निर्भर हैं। इससे सीखना आसान तो हो गया है, लेकिन आलोचनात्मक सोच के लिहाज़ से उतना कठोर नहीं रह गया है। संज्ञानात्मक विकास से जुड़ी शारीरिक गतिविधियां और बाहर खेलना भी पहले की पीढ़ियों की तुलना में बहुत घट गया है।
लेकिन, कम आईक्यू स्कोर का मतलब यह कतई नहीं है कि नई पीढ़ी ‘कम बुद्धिमान’ है। हमें यह समझना चाहिए कि ज्यादातर आईक्यू टेस्ट क्षमता के केवल एक संकीर्ण हिस्से को ही पकड़ते हैं। जेन-जी डिजिटल वातावरण में बेहद सहज है, जल्दी अनुकूलन कर लेती है और उन तरीकों में ज्यादा रचनात्मक है, जिनमें पुरानी पीढ़ियां नहीं थीं। हो सकता है कि वे पारंपरिक मापदंडों पर उतना अच्छा स्कोर न कर पाएं, लेकिन वे उन क्षेत्रों में अपनी ताकत जरूर बना रहे हैं, जिन्हें ये टेस्ट पकड़ नहीं पाते हैं।
इसलिए, यह ‘बुद्धिमत्ता में गिरावट’ से ज्यादा उस बुद्धिमत्ता के प्रकार में ‘बदलाव’ की कहानी है, जो आज के समय में विकसित हो रही है। सच तो यह है कि दुनिया बहुत बदल गई है, और दिमागों के विकसित होने का तरीका भी उसके साथ लगातार बदल रहा है।






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