बिहार में चुनावी सरगर्मियां बहुत तेज हो गई हैं। दल-बदल और राजनीतिक दलों में तोड़म-फोड़ अपने चरम पर है। रोज नए सियासी समीकरण बन रहे हैं। नए-नए प्रयोग भी हो रहे हैं। चिराग पासवान एनडीए में हैं, लेकिन नहीं हैं। वह नीतीश कुमार के साथ भी नहीं हैं। एनडीए उनके दल ‘लोक जनशक्ति पार्टी’ को अपना घटक तो मानता है, लेकिन चुनावी अभियान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फोटो और नाम का इस्तेमाल करने से रोक भी रहा है। इधर, मायावती और असादुद्दीन ओवेसी भी उपेंद्र कुशवाहा के साथ पता नहीं कौन सी चुनावी जमीन ढूंढ रहे हैं। पप्पू यादव का ‘प्रलोग’ यानी ‘प्रगतिशील लोकतांत्रिक गठबंधन’ वाला प्रयोग भी न जाने कौन सा गुल खिलाने वाला है।
जब चुनावी तारीखों की घोषणा हुई थी तब मुख्य मुकाबला एनडीए और यूपीए के बीच प्रतीत हो रहा था, लेकिन अब यह मुकाबला लगभग चतुष्कोणीय हो चला है। कुछ और गठबंधन भी बन सकते हैं, लगातार बन भी रहे हैं। अब देखना यह है कि मतदाता आखिर किस ओर जाएंगे।
चुनावी परिणामों का अंतिम फैसला तो 10 नवंबर को होगा लेकिन बिहार में बन रहे ताजा समीकरणों और चुनावी माहौल पर विस्तार से बात करने के लिए आज हमारे साथ मौजूद हैं वरिष्ठ पत्रकार प्रियरंजन झा...।
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