घरेलू काम काज मे हाथ बंटाकर रोजी-रोटी कमाने वाली 28 साल की पार्वती किताब, अखबार को हसरत से देखती है, पढ़ना उसके लिए सपना है। पार्वती निरक्षर है, अलबत्ता उसके दो भाई कॉलेज मे स्नातकोत्तर शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। उसकी लगभग 50 साल की मां सावित्री भी निरक्षर है, सावित्री बताती है कि उसकी मां ने भी कभी पढ़ाई नहीं की। मां बताती है कि उसका पति और पार्वती का पति कुछ पढ़े-लिखे जरूर हैं। पिता की पहली वाली पुरुषो की पीढ़ी अनपढ़ ही थी लेकिन अब पार्वती के बेटे के साथ उसकी नौ साल की बेटी एक अच्छे स्कूल मे पढ़ती है। अब पार्वती का सपना है कि बड़ी होकर उसकी बेटी 'बड़े घरों की मेडमों' जैसी नौकरी करे, अपनी गाड़ी खुद चलाए और जब उसका मन हो शादी करे ताकि उस के बच्चे अनपढ मां की संतानें नहीं हों। जब उसे सुझाव दिया जाता है कि 'बच्ची के साथ तुम भी पढ़ो' तो उसके चेहरे पर उदासी तैरने लगती है। मद्धिम सी आवाज मे बुदबुदाती है... "अब कहां पढ़ पाऊंगी?"






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