हिमालय के उत्तरी सीमांत क्षेत्रों में स्थित कई गांव पानी की कमी के संकट से जूझ रहे हैं। जिसके कारण स्थानीय लोग अपने सदियों पुराने मूल स्थान को छोड़कर पलायन कर रहे हैं। इन दोनों स्थितियों का कारण हिमालय क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का प्रतिकूल प्रभाव माना जा रहा है। इस बीच, लद्दाख में कृत्रिम यानी मानव निर्मित ग्लेशियर आशा की किरण बनकर उभरे हैं, ताकि पानी की कमी हो हल किया जा सके।
सिंधु नदी के किनारे लेह के कुछ इलाकों में पिछले कुछ वर्षों के दौरान सर्दियों के मौसम में जितनी बर्फबारी होनी चाहिए थी, उतनी नहीं हुई है। इसके कारण यहां के गांव अब पानी की भारी कमी का सामना कर रहे हैं। इतना ही नहीं अब खेती की गतिविधियां भी बंद हो रही हैं।
लेकिन, अब इन गांवों में सर्दियों के मौसम में पानी की कमी की समस्या को हल करने के लिए बर्फ के स्तूपों का निर्माण किया जा रहा है। खासकर, बसंत के महीने में जब लोग बुआई के काम में लगे होते हैं। इस बीच, इनोवेटर और रेमन मैग्सेसे अवार्ड से सम्मानित सोनम वांगचुक लद्दाख में आइस स्तूप के रूप में कृत्रिम ग्लेशियर के काम को सुधारा और तीन आइस स्तूप बनाने के लिए स्थानीय लोगों की मदद कर रहे हैं।
इस बारे में सोनम वांगचुक बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण लद्दाख जैसे पहाड़ों में ग्लेशियर पिघलते जा रहे हैं। इस वजह से लद्दाख में पिछले कई वर्ष से कृत्रिम मानव निर्मित ग्लेशियर बनाने की योजना शुरू हुई। खास तौर पर गांव में पानी के संकट के को कम करने के लिए सर्दियों में जो पानी बहता है और जिसका कोई प्रयोग नहीं है, उसे जमाकर आइस स्तूप बनाने का सिलसिला शुरू हुआ है।
ग्रामीणों को सोनम वांगचुक के इस कृत्रिम ग्लेशियर से बहुत उम्मीदें हैं। लेकिन, अहम विषय यहां जलवायु परिवर्तन हैं और जिसका प्रतिकूल प्रभाव बिल्कुल साफ दिखाई दे रहा है।






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