
करीब चार दशक पहले की बात है। बिहार गांधी शताब्दी समिति में एक कार्यकर्ता के नाते मैं भी जुड़ा था। उसी दौरान मैंने देखा कि सिर पर मैला ढोने वाले दलित समाज के लोगों के साथ संभ्रांत लोग कैसा व्यवहार करते हैं। तब सिर पर मैला ढोने वाले लोगों से उस दौर का संभ्रांत समाज इतना अत्याचार करता था कि मेरा मन भर गया। तभी मैंने सिर से मैला उठाने वाले लोगों की मुक्ति के लिए काम करने की ठान ली।






Related Items
एक छोटी सी दुकान तक ऐसे पहुंची बदलाव की हवा...
दहेज हत्या निजी त्रासदी नहीं, खुला सामाजिक जुर्म है...
फिल्म प्रशंसकों के लिए एक बेमिसाल पड़ाव बन रहा है इफ्फी-2025