बीते 28 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा फ़ैसला दिया है जिसने पूरे मुल्क को झकझोर दिया है। अदालत ने उस शख़्स की ज़मानत रद्द कर दी जिस पर शादी के महज़ चार महीने बाद ही बीवी को ज़हर देकर मारने का इल्ज़ाम है।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और आर महादेवन की बेंच ने साफ़ कहा कि दहेज मौत के मामलों में सबूतों के क़ानूनी अनुमान (सेक्शन 113B) को नज़रअंदाज़ करना “ग़ैर-इंसाफ़ी और विकृत तर्ज़” है। अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि दहेज हत्या कोई निजी त्रासदी नहीं, बल्कि समाज के ज़मीर पर धब्बा और इंसानियत पर सीधा हमला है।
Read in English: How many more daughters will be sacrificed for dowry?
हर बार जब कोई दुल्हन दहेज के लिए जलाई गई, ज़हर दी गई या पीटी जाती है, तबाह सिर्फ़ उसका घर नहीं होता बल्कि पूरी तहज़ीब पर लानत लगती है। अब सवाल यह नहीं कि दहेज बुरा है; सवाल यह है कि क्या हमारे भीतर इसे जड़ से उखाड़ फेंकने की हिम्मत बाक़ी है।
एनसीआरबी के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि हिंदुस्तान में हर साल छह हजार से ज़्यादा औरतें दहेज के नाम पर मौत के घाट उतार दी जाती हैं। क़ानून मौजूद है, दहेज निषेध अधिनियम, आईपीसी 498ए, लेकिन ज़मीन पर लागू करने की नाकामी साफ़ दिखती है।
पुलिस की लापरवाही, सबूतों की अनदेखी, गवाहों को डराना और अदालतों में कमज़ोर पेशी, इन सबकी वजह से दहेज हत्या के मामलों में सज़ा की दर 15 फीसदी से भी कम रह गई है। जिस मुल्क में बेटियों को ज़हर, आग और हिंसा से मारा जाए, वहां सुधार नहीं बल्कि सीधी क्रांति की ज़रूरत होती है।
दहेज की हवस तमिलनाडु से बिहार तक, यूपी से ओडिशा तक, एक ही बेरहम चेहरा लेकर सामने आ रही हैं। देखिए, कुछ ताज़ा मामले। ये झलकियां नहीं बल्कि चीखें हैं... ग्रेटर नोएडा (अगस्त 2025), 26 साल की निक्की को उसके पति, देवर और ससुराल वालों ने पेट्रोल डालकर ज़िंदा जला दिया। शादी में महंगी कार, सोना और नक़द लेने के बाद भी 36 लाख रुपये और लग्ज़री कार की मांग जारी रही। 90 फीसदी जली निक्की अस्पताल पहुंचने से पहले ही दम तोड़ गई।
बेलगावी, कर्नाटक में, 27 साल की शिल्पा पंचंगवी रोज़ाना मारपीट, भूखा रखना और तानों की मार झेलती रही। “कम दहेज” का आरोप उसकी जान पर भारी पड़ा और आख़िरकार उसने फांसी लगा ली। उसके जिस्म पर नीले निशान और रस्सी के गहरे दाग़ उसकी ख़ामोश गवाही बनकर रह गए।
बिहार (जुलाई 2025) में 25 साल की लक्ष्मी कुमारी का गला घोंटकर शव नदी में फेंक दिया गया, ताकि मौत ‘ख़ुदकुशी’ लगे। उसका ‘अपराध’ था, दहेज में दुकान के लिए पैसे न लाना। पोस्टमॉर्टम में उसकी गर्दन की हड्डियां टूटी हुई पाई गईं।
सबसे चौंकाने वाला केस रहा तमिलनाडु का। 24 वर्षीय रिथन्या को ससुराल वालों ने सायनाइड मिला दूध पिलाया। 4.5 किलो सोना लेने के बाद भी 100 करोड़ रुपये के दहेज की मांग की गई। उसकी डायरी में भूखा रखने और रोज़मर्रा के ज़ुल्म के कई ज़िक्र मिले।
उधर, चंडीगढ़ में, 22 साल की नई दुल्हन को महीनों तक गालियां, मारपीट और बंद कमरे में भूखा रखने की यातना दी गई। बाद में उसकी मौत को ‘ख़ुदकुशी’ बताने की कोशिश हुई, लेकिन शरीर पर बचाव के निशान ने ससुराल वालों की कहानी को झुठला दिया।
तमिलनाडु के पोननेरी में शादी के सिर्फ़ चार दिन बाद 20 साल की लड़की ने कीटनाशक खा लिया। जेवर और नक़द की लगातार मांग ने उसकी हिम्मत तोड़ दी और उसने मौत चुन ली।
ओडिशा में एक महिला को उसके किचन में ज़िंदा जला दिया गया, क्योंकि उसने पति की ‘तरक़्क़ी’ के नाम पर मांगा गया दहेज देने से इनकार कर दिया था। जबकि, उत्तर प्रदेश में, 25 वर्षीय गर्भवती महिला को ‘कम दहेज’ के बहाने डंडों से पीट-पीटकर मार डाला गया। उसके पेट में पल रहा बच्चा भी नहीं बच सका।
दिल्ली की 26 साल की एक महिला पर ससुरालवालों ने एसिड से हमला किया। चेहरे का 70 फीसदी हिस्सा जल जाने के बाद वह सेप्सिस से मर गई। उसे मारने के लिए पहले उसका चेहरा मिटाया गया।
इनमें से कितनी मौतों को ‘दुर्घटना’ या ‘आत्महत्या’ बताकर दबा दिया जाएगा, इसका कोई ठीक हिसाब नहीं। परिवार डरते हैं, पड़ोसी मुंह मोड़ लेते हैं, समाज चुप रहता है, और यही ख़ामोशी अपराधियों की सबसे बड़ी ताक़त बन जाती है।
भारत में दहेज कोई रस्म नहीं, एक धीमा ज़हर है जो हर साल हज़ारों घरों को अंदर से खोखला कर रहा है। अब वक़्त आ गया है कि सिर्फ़ क़ानून नहीं, पूरा समाज दहेज के ख़िलाफ़ खड़ा उठे और एक सख़्त एवं संगठित मोर्चा बनाए। अगर सच में बदलाव चाहिए तो आधे-अधूरे कदम नहीं चलेंगे। कुछ बुनियादी क़दम तुरंत ज़रूरी हैं।
दहेज हत्या के मामलों के लिए समर्पित फास्ट-ट्रैक अदालतें और अनिवार्य, उच्च स्तरीय फ़ॉरेंसिक जांच, एआई आधारित हेल्पलाइन और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म, जहां पीड़ित महिलाएं और गवाह सुरक्षित तरीके से शिकायत दर्ज कर सकें। समुदाय स्तर पर सामाजिक बहिष्कार और सार्वजनिक शर्मिंदगी, ताकि दहेज मांगने वालों के लिए ‘इज़्ज़त’ नाम की कोई चीज़ न बचे। पुलिस और अभियोजन के लिए अनिवार्य ट्रेनिंग, ताकि न तो लापरवाही हो और न ही समझ की कमी का बहाना। सुप्रीम कोर्ट ने अपना संदेश साफ़ कर दिया है कि दहेज मौतों के लिए ‘ज़ीरो टॉलरेंस’। लेकिन, अदालत अकेले यह जंग नहीं जीत सकती है।
जब तक पूरा समाज यह साफ़-साफ़ न कह दे, दहेज के लिए एक भी बेटी की मौत बर्दाश्त नहीं होगी, तब तक यह ज़ुल्म चलता ही रहेगा। असली त्रासदी यह है कि हमने इस क़त्ल को लगभग ‘साधारण’ मान लिया है।






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