आगरा कैंट रेलवे स्टेशन के आसपास या यमुना किनारा रोड पर आपने छोटे-छोटे बच्चों को कबाड़ा प्लास्टिक बीनते जरूर देखा होगा। हर कुछ मिनट बाद वे कपड़े में भिगोया गया कोई केमिकल सूंघते हैं, जैसे वही उनकी भूख हो, वही उनका सुकून। शहर के नामी स्कूलों के इर्द-गिर्द ‘पुड़िया गैंग’ की फुसफुसाहटें हैं। शादी हो या बर्थडे पार्टी, बीयर और दारू अब रिवाज़ बन चुके हैं। कोई खांसी का सिरप गटक रहा है, कोई जर्दा, टिंक्चर या सुलोचन की बोतल। तन-बदन बेहाल, आंखें सूनी, दिमाग खिसका या भटका हुआ, नालियों और कूड़े के ढेरों में भविष्य तलाशती यह पीढ़ी आखिर किस दिशा में जा रही है?
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