दुनिया

पश्चिमी दुनिया की राजनीति एक रंगमंच बन चुकी है, जहां लोकतंत्र का मुखौटा पहनकर साम्राज्यवाद का नंगा नाच होता है। मानवाधिकारों की दुहाई देने वाले खुद युद्ध के सौदागर हैं। कहते हैं शांति, करते हैं तबाही, और परिणाम होता है एक डील, फायदे का सौदा। क्या यही है सभ्यता का पश्चिमी मॉडल — झूठ, छल और पाखंड का गठबंधन…?

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पाकिस्तान आज एक नाज़ुक मोड़ पर खड़ा हुआ है। इसका भविष्य आंतरिक कमज़ोरियों और बाहरी दबावों के जाल में कस कर उलझ गया है।

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व्यापारी हैं और ईरान का जीवित रहना अमेरिकी हितों के लिए उसके विनाश से कहीं अधिक मूल्यवान है। एक पराजित ईरान उस नाजुक भय के संतुलन को बिगाड़ देगा जो अमेरिका के हथियार व्यापार और क्षेत्रीय प्रभाव को बढ़ावा देता है...

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भारत के चारों तरफ़ इस वक़्त एक अशुभ ‘आर्क ऑफ इंस्टैबिलिटी’ यानी अस्थिरता का घेरा बन गया है। एक-एक कर पड़ोसी मुल्क आर्थिक तबाही, सियासी उथल-पुथल और जनाक्रोश की आग में जल रहे हैं। नेपाल की ‘सोडा वाटर क्रांति’ से लेकर श्रीलंका के ‘राजपक्षा विद्रोह’ तक, नौजवानों की आवाज़ें ज़ोर से गूंजीं, लेकिन सत्ता के क़िलों को हिला पाने में नाकाम रहीं। ये अलग-थलग वाक़ये नहीं हैं, बल्कि पूरी दक्षिण एशिया की साझा त्रासदी है।

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आज कल राजनयिक भाषा का स्तर गिरता जा रहा है, जैसा कि डोनाल्ड ट्रंप और उनके साथियों ने दिखाया है। उनकी बातचीत का तरीका बहुत ही निचले दर्जे का, अकड़ू, हठी और बेअदबी है। यह एक तरह की तहज़ीब की कमी को दिखाता है, जहां नफ़ासत, शालीनता और समझदारी की जगह सिर्फ़ गुस्ताखी, अशिष्टता और जबर्दस्ती रह गई है। कुछ बयान हादसा नहीं होते, वे जानबूझकर की गई बदतमीजी होते हैं।

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वाशिंगटन की राजनीतिक हवाएं एक बार फिर अप्रत्याशित रूप से बदल गई हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जो भारत को अपना विश्वसनीय साझेदार बताने में पीछे नहीं हटते थे, ने अचानक भारतीय आयातों पर 50 फीसदी टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी और भारत की अर्थव्यवस्था को ‘डेड इकॉनमी’ तक कह डाला।

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