पश्चिमी दुनिया की राजनीति एक रंगमंच बन चुकी है, जहां लोकतंत्र का मुखौटा पहनकर साम्राज्यवाद का नंगा नाच होता है। मानवाधिकारों की दुहाई देने वाले खुद युद्ध के सौदागर हैं। कहते हैं शांति, करते हैं तबाही, और परिणाम होता है एक डील, फायदे का सौदा। क्या यही है सभ्यता का पश्चिमी मॉडल — झूठ, छल और पाखंड का गठबंधन…?
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