बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

पिछले दिनों, नई दिल्ली में एआई शिखर सम्मेलन की चकाचौंध रही। दुनियाभर के विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं और टेक कंपनियों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के भविष्य पर मंथन किया। मंच पर ‘डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन’ की बातें हुईं। ऐप्प, क्लाउड और स्मार्ट प्लेटफॉर्म की चर्चा हुई। लेकिन, इसी डिजिटल उछाल के साथ एक नया संकट भी लगातार गहरा रहा है। हर नई तकनीक, हर अपग्रेड, हर नया डिवाइस… पीछे छोड़ जाता है, ई-कचरे का एक और ढेर।

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भारत में नृत्य महज मनोरंजन का साधन नहीं रहा है, बल्कि यह आत्मा की ज़बान भी रहा है। मंदिरों की देहरी से लेकर राजदरबारों तक, गांव की चौपाल से लेकर बड़े रंगमंच तक, नृत्य ने भाव, राग और रस की परंपरा को ज़िंदा रखा है...

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रेगिस्तान की ख़ामोशी हो या आसमान की चमकती रोशनी, इंसान सदियों से यह सवाल पूछता आया है कि क्या हम इस कायनात में अकेले हैं...

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नक्सलवाद की बारूद भरी राह पुलिस की गोली से रुकी या विकास की रोशनी से? सच शायद इन दोनों के बीच में कहीं खड़ा है...

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अगर ताज महल एक सुबह खामोश हो जाए, तो क्या आगरा भी चुप पड़ जाएगा? जवाब है “नहीं”। तब शायद पहली बार यह शहर अपनी असली आवाज़ में बोलेगा, कारीगरों की हथौड़ी की टन-टन, बाजारों का मोल-भाव, हलवाइयों की कड़ाही की खुशबू और शायरों की नज़्मों के बीच। ताज महल आगरा का ताज है, लेकिन आगरा सिर्फ ताज नहीं, यह एक चलती-फिरती सभ्यता है...

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कभी जिसके तट पर बंसी बजी थी, आज वहीं सन्नाटा है। कभी जिसके जल में आस्था डुबकी लगाती थी, आज वही जल ज़हर बन चुका है। ब्रज मंडल की जीवनरेखा कही जाने वाली यमुना आज अपने अस्तित्व की जंग लड़ रही है। नदी नहीं, नाला दिखती है। पानी नहीं, काला, बदबूदार, झाग से भरा तरल बहता है। तस्वीरें चीख रही हैं। सच सामने है। सवाल सिर्फ एक है कि क्या हम सचमुच यमुना को बचाना चाहते हैं?

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