बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

बहुत पुरानी बात है, जब मोबाइल नहीं, पर मुंह बहुत चला करते थे। आगरा में मुगल बादशाह के जागीरदार का एक गांव था टेढ़ी बगिया के पास, ‘ठुमकपुर’। वहां की सबसे नामी ठुमकिया थी, चंपा देवी झटकनिया। नाम ऐसा कि सुनते ही पायल खुद बज उठे, पर असलियत कुछ और ही थी...

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भारत में कुल 2,827 राजनीतिक पार्टियां पंजीकृत हैं, जिनमें छह राष्ट्रीय, 58 राज्य, और 2,763 गैर-मान्यता प्राप्त दल शामिल हैं। यह आंकड़ा चुनाव आयोग की 23 मार्च 2024 की रिपोर्ट का है। इस साल जनवरी में जनसेना को राज्य पार्टी का दर्जा मिलने के बाद इस सूची में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। इतनी पार्टियों के बावजूद सवाल वही है, लोकतंत्र की शुचिता बार-बार क्यों लांछित होती है...

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एक ज़माना था जब विश्वविद्यालयों के कैंपस गूंज उठते थे—"इंकलाब जिंदाबाद!", "हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के!" के नारों से। विश्वविद्यालयों की दीवारें सिर्फ पत्थर नहीं, विचारों की आग से लाल होती थीं। बीएचयू, इलाहाबाद, दिल्ली, लखनऊ—हर कैंपस में बहसें होती थीं, छात्र नेताओं के भाषणों में आग होती थी। आज? सन्नाटा। सिर्फ फुसफुसाहटें। क्या हमारा लोकतंत्र सो गया है?

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एक सड़क बता दो, जहां इत्मीनान से, बिना कुचले जाने के खौफ के, आप साइकिल की सवारी कर सकते हैं। यूरोप के तमाम शहरों में आज भी ज्यादातर लोग साइकिल की सवारी करते हैं!

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कुल 140 करोड़ भारतीयों में से कितने लोग बड़ी कारें या फैंसी मोबाईक खरीद सकते हैं? खरीद भी लें किश्तों पर, तो भी पेट्रोल कौन सा मुफ्त मिल रहा है! हकीकत यह है कि एक बड़ी संख्या में लोग आज भी सड़कों पर, शहर हो या देहात, पैदल ही चल रहे हैं या साइकिलों पर ही निर्भर हैं। लेकिन, इस बड़े समूह के हितों की रक्षा के लिए कभी कोई आवाज नहीं उठती...

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फर्ज़ी डायबिटीज़ इलाज से लेकर सियासी रिश्वतों तक, हनी ट्रैप से लेकर क्रिप्टो ठगी तक, आज का भारत एक धोखाधड़ी के मेले में बदल चुका है, जहां ईमान की जगह चालाकी फल-फूल रही है। हर क्लिक के पीछे कोई जाल है, हर वादा एक फ़रेब।

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