बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

बीते 22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर में 26 निर्दोष पर्यटकों की हत्या केवल आम नागरिकों पर हमला नहीं था, बल्कि भारत की संप्रभुता और दृढ़ता को चुनौती थी। ऑपरेशन सिंदूर के तहत, भारत ने पाकिस्तान और पाक-अधिकृत कश्मीर में आतंकी ठिकानों पर सटीक सैन्य कार्रवाई करके साफ संदेश दिया कि अब भारत सीमा-पार से आतंकवाद बर्दाश्त नहीं करेगा।

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‘जब शासन सोता है, तो अराजकता पनपती है’, यह कहावत भारत की सड़कों पर चरितार्थ हो रही है। आवारा कुत्ते, बेसहारा गायें और उन्मुक्त्त बंदर आज हमारे मोहल्लों और गलियों को मैदान-ए-जंग बना चुके हैं, और तमाम सरकारी एजेंसियां तालमेल के अभाव में महज तमाशबीन बनी बैठी हैं...

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राजनीति शास्त्र की किताबें कहती हैं कि लोकतंत्र की बुनियाद ‘कानून के सामने बराबरी’ के सिद्धांत पर टिकी हुई है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 भी यही कहता है, लेकिन हक़ीक़त में यह सिद्धांत उन्हीं के पैरों तले कुचला जा रहा है, जो इंसाफ़ और हुकूमत के ‘रखवाले’ होने का ढोंग करते हैं। और ये हैं... जज, राज्यपाल, नेता व नौकरशाह। ये लोग कानून को अपने हिसाब से अपने पक्ष में घुमा लेते हैं क्योंकि इनको विशेषाधिकार प्राप्त हैं। जानकार बताते हैं कि विशेष दर्जा प्राप्त इन महान विभूतियों की एक लंबी लिस्ट भारत के हर हाइवे के टोल बूथ पर लगी होती है।

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दिल्ली की जाम नालियां, मुंबई के कचरे से पटे समुद्र तट, हिमालय की पगडंडियों पर बिखरे रैपर, वाराणसी और वृंदावन के घाटों पर तैरती बोतलें और माला… आज भारत का हर कोना प्लास्टिक से घिरा है। यह जहरीला बोझ मिट्टी को बंजर बना रहा है, नदियों का दम घोंट रहा है, जानवरों की जिंदगी छीन रहा है और पवित्र स्थलों की आभा धूमिल कर रहा है...

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साल 1973 में जब बॉबी फिल्म आई थी, करोड़ों बूढ़े और जवानों में करेंट आ गया था। सोलह वर्ष में प्यार हो जाने से जूली को पहचान मिली। किशोरावस्था के प्यार और रोमांस के किस्से सदियों से आकर्षित करते रहे हैं।

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उत्तर प्रदेश में ‘ऑपरेशन लंगड़ा’ की सफलता के बाद, अनेक राज्यों में पुलिस तंत्र को अधिक कड़क और सख्त बनाने की कवायदें शुरू हो चुकी हैं। क्या बिना बुनियादी सुधारों के पुलिस तंत्र को और अधिक आजादी देना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप होगा?

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