बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

एक जमाने में आगरा की गिनती विकसित औद्योगिक क्षेत्र के रूप में होती थी। यहां के कारखानों की गूंज देश-विदेशों में होती थी। लाखों लोग रोजगार पाते थे। हुनर और कौशल की पूजा होती थी। फिर 1993 में एक भूचाल आया। ताज महल को प्रदूषण से बचाने को सुप्रीम कोर्ट ने दखल दी और उद्योगों पर तमाम बंदिशें लगा दीं। पचास लाख की आबादी वाले इस शहर में, पिछले तीन दशकों में औद्योगिक विकास के नाम पर शून्य काम हुआ है। तसल्ली होती अगर शहर हर-भरा और प्रदूषणमुक्त हो गया होता, लेकिन वही ढाक के तीन पात, यानी माया मिली न राम…!

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उम्रदराज होना, बाल सफेद होना, कोई अभिशाप नहीं बल्कि तजुर्बे से मिला एक विशेषाधिकार है। आजकल युवा वर्ग बुजुर्गों को गरिया रहा है, बेघर कर रहा है, अमानवीय व्यवहार कर रहा है, यह भूलकर कि जो पैदा हुआ है वह स्वर्गवासी होने से पहले इस दयनीय अवस्था से जरूर गुजरेगा।

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अगर भारत ने पाकिस्तान पर अपनी पूरी परमाणु क्षमता का इस्तेमाल करके खुली जंग छेड़ी, तो इसके नतीजे केवल पाकिस्तान के लिए नहीं बल्कि इस पूरे क्षेत्र व पूरी दुनिया के लिए क़यामत से कम नहीं होंगे...

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संयुक्त परिवारों के बुजुर्ग आजकल लड़कों की शादी करने से घबराने लगे हैं। उन्हें बहुओं का खौफ सता रहा है। उधर, नौकरी कर रहे युवा अकेले रहना पसंद करने लगे हैं, शादियों के बंधन से मुक्त ‘लिव-इन रिलेशन’ में, अंजाम जो भी हो। सात जन्मों का बंधन सात साल चल जाए तो शादी सफल मानी जा रही है।

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अपनी सांस्कृतिक विरासत और प्रसिद्ध ताजमहल के लिए मशहूर स्मार्ट सिटी आगरा एक नई समस्या से जूझ रहा है। अवैध स्ट्रीट फूड स्टॉल, खोमचे, ठेले, और तमाम फुटकर सामान बेचने वालों की शहर में लगातार अनियंत्रित वृद्धि हो रही है...

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आगरा, जो कभी मुग़लिया सल्तनत की शान और ताजमहल की रूहानी खूबसूरती के लिए मशहूर था, आज अपनी प्यास बुझाने को तरस रहा है...

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