बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

भारत ने आज़ादी के बाद अपने इतिहास में कई महत्वपूर्ण अवसरों को गंवाकर आर्थिक मोर्चे पर भारी कीमत चुकाई है। इसका बड़ा कारण रहा कांग्रेस पार्टी की गांधीवादी विचारधारा के प्रति एक दिखावटी प्रतिबद्धता, जिसने बार-बार लघु, सूक्ष्म और कुटीर उद्योगों को प्राथमिकता दी, इस उम्मीद में कि इससे गांवों की अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा। लेकिन, ऐसा नहीं हुआ...

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अंदाज लगाइए दस हजार वर्ष पूर्व गुफा से बाहर निकले आदि मानव ने सर्व प्रथम किस इंसानी जिस्म के अंग को ढका होगा और क्यों?

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भारत आज एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ा है, जहां यह सिर्फ सीमाओं की रक्षा नहीं, बल्कि अपनी सभ्यता, संस्कृति और भविष्य की लड़ाई लड़ रहा है। यह संघर्ष केवल आतंकवाद के खिलाफ नहीं, बल्कि उस मध्ययुगीन मानसिकता के विरुद्ध है, जो मानवता को गुलाम बनाना चाहती है। यह जंग है—आधुनिकता बनाम बर्बरता, प्रगति बनाम पिछड़ापन, एकता बनाम टुकड़ों में बंटी सोच...

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ओला, जोमैटो, स्विगी के बाद, ब्लिंकिट, इंस्टमार्ट जैसी होम डिलीवरी सर्विस से सेक्स टॉयज, कंडोम और सैनिटरी नैपकिंस अब घर बैठे और बिना झिझक के वाजिब दामों पर मिल रहे हैं। अब बस लोगों को इंतज़ार है कि सिगरेट, पान और दारू सप्लाई अब कब शुरू होगी!

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आगरा में करणी सेना और समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच हाल ही में हुआ शक्ति प्रदर्शन सिर्फ एक स्थानीय घटना नहीं थी, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की गहराई तक फैले जातिवादी सियासत के ज़हर की बानगी है...

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भूत चुड़ैलों का साया है, वास्तु दोष है, डिजाइन फॉल्ट है, या भटकती आत्माएं शांति और मुक्ति के लिए कुछ धार्मिक अनुष्ठानों के आयोजन के इंतेज़ार में हैं, कौन देगा इन प्रश्नों का उत्तर, कितनी और जानें कुर्बान होनी हैं, कितने परिवार उजड़ने हैं?

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