बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

साल 2026 की शुरुआत में कर्नाटक एक अजीब विरोधाभास से गुजर रहा है। एक ओर राज्य की राजनीति कांग्रेस के भीतर नेतृत्व संघर्ष, गुटबाज़ी और सत्ता-संतुलन की रस्साकशी में उलझी है, तो दूसरी ओर अर्थव्यवस्था पूरे वेग से आगे बढ़ रही है। सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच ठंडी लेकिन लगातार बनी रहने वाली तनातनी ने राजनीतिक माहौल को अस्थिर बना रखा है, फिर भी विकास की गाड़ी रुकी नहीं है...

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सुबह की धूप अभी हल्की थी। मेरठ जिले के एक गांव में किसान रमेश अपने खेत पर खड़े थे। मोबाइल हाथ में थामे, वह स्क्रीन पर चमकते मौसम अलर्ट पर नजर गड़ाए हुए थे, “आज सिंचाई नहीं।”, उन्होंने तुरंत मोटर बंद कर दी। मुस्कराते हुए बोले, “अब खेत आसमान देखकर नहीं, ऐप्प देखकर चलते हैं।

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सुबह की धुंध में ताज महल जब धीरे-धीरे उभरता है, तो लगता है कोई राज़ खोलने वाला है। संगमरमर की खामोशी पूछती है, क्या इश्क़ अब भी इतना ही गहरा है, या वह मोबाइल की स्क्रीन पर सिमट गया है?

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पिछले साल जब एक उम्रदराज़ ‘महान’ नेता ने शांति के लिए नोबेल प्राइज की इच्छा जाहिर की थी, तब ही समझ लेना चाहिए था कि शांति का मतलब युद्ध तनाव होता है। यह वही दोहरी ज़ुबान है, जिसे जॉर्ज ऑरवेल ने ‘डबलस्पीक’ कहा था, जो अब उस लोकतंत्र की पहचान बन चुकी है, जिसने ताक़त और डर को अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया है...

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एक पनडुब्बी अनजाने समंदर की गहराइयों में उतरती है, वो भी 1870 में, जब बैटरी नाम की चीज़ बस एक तजुर्बा भर थी। एलियन तीन पैरों वाली डरावनी मशीनों से हमला करते हैं, और वही कल्पना इंसानों को चांद तक ले जाने वाले रॉकेट की प्रेरणा बन जाती है। बिजली से ‘ज़ॉम्बी’ को ज़िंदा करने की कहानी, आज अस्पतालों में दिल बचा रही है...

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उत्तर भारत में घूंघट सिर्फ़ एक परंपरा नहीं, बल्कि औरत की पहचान पर एक सवालिया निशान है। यह लेख एक महिला की ज़िंदगी के ज़रिये उस ख़ामोश क़ैद और धीमी आज़ादी की कहानी कहता है, जहां तालीम, काम और आत्मसम्मान ने घूंघट की घुटन को तोड़ा। यह दास्तां है बिना शोर के आए बदलाव की...

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