धर्मेंद्र कुमार

दैनिक जागरण, अमर उजाला, नवभारतटाइम्स.कॉम और एनडीटीवीखबर.कॉम के रास्ते पत्रकारिता में पिछले दो दशक से ज्यादा समय से सक्रिय धर्मेंद्र कुमार मीडियाभारती वेब सॉल्युशन्स के प्रमुख हैं।

भारत में हर 20 मिनट में एक महिला के साथ यौन हिंसा रिपोर्ट की जाती है। इसी भयावह आंकड़े को याद दिलाने के लिए फिल्म ‘अस्सी’  में हर 20 मिनट बाद लाल स्क्रीन पर ‘20 मिनट’ लिखा आता है, मानो दर्शकों को झकझोर कर यह बताने के लिए कि वे जिस कहानी को देख रहे हैं, उसका आधार यह वास्तविकता है। शायद, यही शीर्षक फिल्म के लिए अधिक सार्थक भी होता...

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आईडीएफसी फर्स्ट बैंक को लेकर बाजार में माहौल अचानक बदल गया। मानो रातों-रात सब कुछ उलट गया हो। चंडीगढ़ शाखा में ₹590 करोड़ के घोटाले का खुलासा हुआ, जो हरियाणा सरकार से जुड़े खातों से संबंधित था। खबर ने बाजार को हिला दिया। हालांकि, सरकार की प्रतिक्रिया तेज और सख्त रही और बैंक को ‘डी-एम्पैनल’ कर दिया गया। राज्य के कारोबार को संभालने की भूमिका छीन ली गई।

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बैंक ऑफ इंडिया एक अनुभवी संस्थान की तरह है जो तेज़ी से बदलते वित्तीय परिदृश्य में खुद को नए सिरे से गढ़ने की कोशिश कर रहा है। हाल के वर्षों में बैंक के शेयर को मज़बूत रिटर्न और बेहतर लाभप्रदता का सहारा मिला है, और यह रफ़्तार संकेत देती है कि यह भारत की व्यापक आर्थिक विकास यात्रा पर आगे भी सवार रह सकता है...

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स्मॉल-कैप म्यूचुअल फंड में आगे का सफ़र काफी उतार-चढ़ावभरा हो सकता है। पिछले कुछ समय से इस श्रेणी में बेहतर रिटर्न नहीं मिले हैं। इसलिए, काफी समय से ठहरे हुए स्मॉल-कैप म्यूचुअल फंड में अब थोड़ी बेहतरी की उम्मीद जग रही है।

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इन्फोसिस का एंथ्रॉपिक के साथ गठजोड़ उसके शेयरों की कहानी में नई ऊर्जा लेकर आया है। घोषणा के तुरंत बाद शेयर लगभग 3–4 फीसदी तक चढ़ गए, हालांकि, बाद में एक नए स्तर पर ठहर भी गए। लेकिन, यह उछाल केवल प्रचार का असर नहीं था, बल्कि इसने निवेशकों के विश्वास को दिखाया कि इन्फोसिस एआई को अपनी सेवाओं में गंभीरता से शामिल कर रहा है, न कि महज उससे प्रभावित हो रहा है...

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​'दो दीवाने सहर में' हां, बिल्कुल सही लिखा है। शब्द 'सहर' है, 'शहर' नहीं। सहर का अर्थ उर्दू में 'सुबह' होता है। हालांकि, इस 'सुबह' से फिल्म का कोई लेना-देना नहीं है। अब, चूंकि फिल्म का हीरो 'श' को 'स' बोलता है, तो फिल्म के टाइटल में भी 'स' है। वैसे फिल्म की हीरोइन को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उसका हीरो 'श' को 'स' बोले या 'फ'। फिल्म के अंत तक वह अपने रिश्ते को लेकर 'फ्योर', मतलब 'स्योर', नहीं हो पाती है। निर्देशक रवि उदयवार की कारकिर्दगी भी कुछ-कुछ ऐसी ही लगती है।

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