कब थमेगी पश्चिम एशिया की यह भीषण जंग…?


भरी गर्मी में लगी यह आग कब बुझेगी? जंग कब खत्म होगी? तबाही के मंजर पूछ रहे हैं कि विश्व युद्ध शुरू हुआ है या खत्म?

पश्चिम एशिया धधक रहा है। 28 फरवरी से आग लगी हुई है। अमेरिका और इज़राइल ने मिलकर ईरान पर बड़ा हमला किया। नाम दिया ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’, और पहले ही दिन भूचाल आ गया। जब ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई मारे गए। कई बड़े कमांडर खत्म। सैन्य ठिकाने तबाह। लेकिन, कहानी वहीं खत्म नहीं हुई। ईरान ने जवाब दिया। मिसाइलें चलीं। ड्रोन उड़े। निशाना बने, इज़राइल, अमेरिकी ठिकाने और खाड़ी के देश।

पूरा इलाका दहशत में आ गया। सबसे बड़ा झटका तब लगा जब होर्मुज़ की खाड़ी बंद हो गई। दुनिया के तेल का बड़ा रास्ता वहीं से गुजरता है। तेल की सप्लाई अचानक गिर गई। कीमतें उछल गईं। 40 दिन बीत चुके हैं। लेकिन, जंग थमी नहीं। कोई आसार भी नहीं दिख रहे हैं।

कौन जीतेगा? यह अंदाजा लगाना थोड़ा मुश्किल है। युद्ध में जीत हमेशा साफ नहीं होती है। अमेरिका और इज़राइल कह रहे हैं कि ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमता 90–95 प्रतिशत खत्म हो चुकी है। ईरान कह रहा है कि लड़ाई अभी जारी है। नया नेतृत्व सामने आ चुका है। मोज्तबा खामेनेई ने साफ कहा है कि “मुकाबला जारी रहेगा।”

सच्चाई शायद बीच में कहीं है। ईरान की सेना कमजोर हुई है। लेकिन, उसके प्रॉक्सी नेटवर्क अभी जिंदा हैं। हिज़्बुल्लाह, हूती, इराक़ की मिलिशिया, ये छोटे-छोटे कांटे हैं जो बड़ी ताकतों को भी चुभते रहते हैं। इसलिए, शायद कोई “पूरी जीत” नहीं होगी। बस ईरान को बहुत कमजोर कर दिया जाएगा।

इस जंग का एक बड़ा मुद्दा था, ईरान का परमाणु कार्यक्रम। लेकिन, सच यह है कि वह पहले ही काफी पीछे जा चुका था। 2025 में भी कई बड़े प्लांट नष्ट हो चुके थे। अब नए हमलों ने उसे और पीछे धकेल दिया है। अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियां कह रही हैं, अभी जल्दी बम बनने की कोई संभावना नहीं दिखती है। यानी परमाणु खतरा फिलहाल लगभग खत्म हो चुका है।

इस युद्ध ने अमेरिका की ताकत भी दिखाई और उसकी मुश्किल भी। उसने दिखाया कि जरूरत पड़े तो वह बड़ा हमला कर सकता है। लेकिन, खाड़ी के देशों में एक नई बेचैनी है। वे पूछ रहे हैं कि क्या अमेरिकी सुरक्षा ही हमें खतरे में डाल रही है? यूरोप में भी सवाल उठे हैं। कई लोग इसे गैरकानूनी हमला कह रहे हैं।

भविष्य अभी धुंधला है। लेकिन, जंग के बाद चार तस्वीरें दिखाई देती हैं। पहली तस्वीर, ईरान का शासन गिर जाए। नई सरकार आए। न्यूक्लियर साइट अंतर्राष्ट्रीय नियंत्रण में चली जाएं। तेल फिर बहने लगे। दूसरी तस्वीर यह है कि ईरान का शासन बच जाए। लेकिन, बहुत कमजोर। छिटपुट हमले जारी रहें। तेल महंगा बना रहे। तीसरी तस्वीर यह कि जंग और फैल जाए। तुर्की, इराक़, लेबनान तक। अगर, चीन और रूस खुलकर कूद पड़े, तो दुनिया आर्थिक संकट में जा सकती है। और, चौथी तस्वीर यह कि सब थक जाएं। फिर बातचीत शुरू हो। एक नया समझौता बने। कुछ वैसा, जैसा कभी JCPOA था।

JCPOA यानी Joint Comprehensive Plan of Action, साल 2015 का एक अंतर्राष्ट्रीय परमाणु समझौता था। इसमें ईरान ने अपने न्यूक्लियर कार्यक्रम को सीमित करने पर सहमति दी, और बदले में उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटाने का वादा किया गया था।

इस जंग ने एक भ्रम तोड़ दिया है। “अमेरिका हमेशा बचाएगा”। अब खाड़ी के देश नई सोच में हैं। यूएई, सऊदी अरब, कतर, अब वे कई दिशाओं में रिश्ते बनाएंगे। फ्रांस से हथियार। चीन से टेक्नोलॉजी। भारत से व्यापार। यानी, एक मल्टी-पोलर सुरक्षा मॉडल।

अभी संकट के समय डॉलर मजबूत हुआ है। लोग सुरक्षित मुद्रा ढूंढते हैं। लेकिन, अगर तेल का संकट लंबा चला तो नई कहानी शुरू हो सकती है। ब्रिक्स देश पहले से ही विकल्प ढूंढ रहे हैं। चीन, रूस, भारत। अगर तेल का व्यापार डॉलर से बाहर गया तो पेट्रोडॉलर व्यवस्था हिल सकती है। इस जंग का सबसे बड़ा आर्थिक झटका एशिया को लगेगा। भारत और चीन दोनों आधे से ज्यादा तेल खाड़ी से लेते हैं। कीमतें बढ़ीं तो असर पड़ेगा।

भारत क्या कर रहा है? रूस से सस्ता तेल खरीद रहा है। रणनीतिक भंडार का इस्तेमाल कर रहा है। सोलर और कोयले पर जोर दे रहा है। चीन भी यही कर रहा है। रूस और अफ्रीका से तेल ले रहा है। ऊर्जा बचत बढ़ा रहा है। वृद्धि थोड़ी धीमी होगी। लेकिन, दोनों बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं। संभाल लेंगी।

एक सवाल और उठता है कि संयुक्त राष्ट्र कहां है? सच यह है कि उसका दखल तभी होगा जब मानवीय तबाही बहुत बढ़ जाए। लाखों शरणार्थी बनें। भुखमरी बढ़े। बड़े पैमाने पर विनाश हो। लेकिन, तब भी एक समस्या रहेगी। अमेरिका का वीटो। और दुनिया फिर कहेगी, कि संयुक्त राष्ट्र एक बेबस संस्था बन गया है।

इस युद्ध ने एक और सच दिखाया। जंग का तरीका बदल गया है। हजारों सस्ते ड्रोन। सैकड़ों मिसाइलें। महंगे एयर डिफेंस सिस्टम भी बेकार साबित हो सकते हैं। फाइटर जेट अब बिना इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा के नहीं उड़ते हैं। जमीन पर सेना छोटे-छोटे समूहों में चलती है। टैंक बनाम टैंक की लड़ाई का दौर खत्म हो रहा है। अब असली युद्ध है, ड्रोन, साइबर, स्टैंड-ऑफ मिसाइल।

अब सवाल यह उठता है कि आखिरकार इस जंग में सबसे बड़ी कीमत कौन दे रहा है? आम लोग। लाखों बेगुनाह। घर उजड़ गए हैं। शहर खामोश हो गए हैं। लेकिन, इतिहास अक्सर ऐसे ही मोड़ों पर बदलता है। शायद यह जंग भी दुनिया को एक सबक दे। कोई एक ताकत पूरी दुनिया को नियंत्रित नहीं कर सकती। नए रिश्ते बनेंगे। नई रणनीतियां बनेंगी। और, शायद ऊर्जा की दुनिया भी बदल जाएगी। पश्चिम एशिया की यह जंग सिर्फ एक युद्ध नहीं। यह बदलती हुई दुनिया का ऐलान भी है।



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