यमुना शुद्धि के लिए दृढ़ संकल्पित यमुना मिशन
मथुरा। यमुना मिशन कार्यालय (रमणबिहारी गौशाला) सरस्वती कुण्ड मथुरा पर आज महाराणा प्रताप के जन्मोत्सव पर उनके चित्र के समक्ष पुष्पमाला, पुष्पवर्षा एवं दीप प्रज्वलित कर उन्हें याद किया गया। यमुना मिशन के संयोजक पं. अनिल शर्मा ने कहा कि हमने यमुना शुद्धि का जो संकल्प लिया है। उसे हम समाज के बुद्धिजीवियों एवं युवाओं के साथ मिलकर यमुना को स्वच्छ करके ही दम लेंगे। उन्होंने कहा कि महाराणा प्रताप की जयन्ती ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष तृतीया को मनायी जाती है। राजस्थान के कुंभलगढ़ में महाराणा प्रताप का जन्म महाराजा उदय सिंह एवं माता राणी जीवत कंवर के घर ई.स.1540 में हुआ था। मेवाड़ की शौर्य भूमि धन्य है जहां वीरता वाले महाराणा प्रताप का जन्म हुआ।
चै.गंगेश्वर प्रसाद एडवोकेट ने कहा कि महाराणा प्रताप ने इतिहास में अपना नाम अजर-अमर कर दिया। उन्होंने धर्म और स्वाधीनता के लिए अपना बलिदान दिया। हल्दीघाटी युद्ध में करीब 20 हजार राजपूतों को साथ लेकर महाराणा प्रताप ने मुगल सरदार राजा मानसिंह की 80 हजार सेना का सामना किया।
रविन्द्र नरवार ने कहा कि महाराणा प्रताप के पास सबसे प्रिय घोड़ा था जिसका नाम चेतक था। इस युद्ध में चेतक की भी मृत्यु हो गई थी। मेवाड़ को जीतने के लिए भी अकबर ने भी प्रयास किये महाराणा प्रताप ने अकबर की अधीनता को स्वीकार नहीं किया। रण-बीच चैकड़ी भर-भरकर चेतक बन गया निराला था। राणा प्रताप के घोड़े से पड़ गया हवा का पाला था। गिरता न कभी चेतक तन पर राणा प्रताप का घोड़ा था। राणा की पुतली फिरी नहीं तब तक चेतक मुड़ जाता था।
इस अवसर पर हरीश शर्मा, गोलू पंडित, अज्जू पंडित, रमेश ठाकुर, गीतम ठाकुर, राधारमण ठाकुर, महेश पंडित शिवा ठाकुर, अनिल ठाकुर, कौशिक, पुष्पेन्द्र चतुर्वेदी, मनीष सक्सेना, मनीष राज, भीम, सिद्धार्थ शर्मा, शंशाक शर्मा, शरद शर्मा, तरुण शर्मा, आदित्य जैन, तुषार पारिक, विष्णु पंडित, ओमप्रकाश चैधरी आदि उपस्थित थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता गंगाराम सिसौदिया एवं धन्यवाद ज्ञापन मुकेश सिसौदिया ने किया।
भगवान परशुराम के चित्रपट पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन
मथुरा। प्रतिदिन पूजी जाने वाली भगवान परशुराम के चित्रपट पर यमुना मिशन कार्यालय एवं स्वामीघाट स्थित कृष्ण कुमार शर्मा उर्फ टुनटुन के यहां भगवान परशुराम के चित्र पट पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलित किया। इस अवसर पर अनिल परशुराम ने कहा कि राजा सहत्रबाहु और भगवान परशुराम का महाभारत की तरह घर-घर की लड़ाई थी। राजा सहत्रबाहु भगवान परशुराम के मौसाजी थे। भगवान परशुराम भगवान विष्णु का 6वां अवतार माना जाता है। उन्होंने तत्कालीन अत्याचारी और निरंकुश क्षत्रियों का 21 बार संहार किया था।






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