क्या कोई ऐसा मानक है कि फलां फिल्म ओटीटी पर रिलीज होगी और फलां सिनेमाघरों में!? यदि नहीं तो 'सूबेदार' को ओटीटी पर रिलीज करना एक 'भूल' ही कहा जाएगा। अनिल कपूर फिल्म के निर्माताओं में से एक हैं और पूरी फिल्म को अपने कंधों पर रखकर चलते हैं। फिर उन्होंने इसे सिनेमाघरों में रिलीज करने का 'जोखिम' क्यों नहीं उठाया! यह जोखिम ले लेते तो दर्शक शायद उन्हें निराश नहीं करते। इस फिल्म में उन्हें देखकर 'तेजाब' वाला 'मुन्ना' याद आ जाता है।
वैसे, फिल्म को देखकर पुराना कुछ न कुछ याद आता ही रहता है। सौरभ शुक्ला को देखकर उनके 'बैंडिट क्वीन' वाले दिन याद आ जाते हैं। खलनायक की पिटाई के बाद अनिल कपूर का अपने घर का पता बताने का अंदाज 'अग्निपथ' में अमिताभ के "नाम..., विजय दीनानाथ चौहान..." वाले डायलॉग की याद दिला देता है। ऐसे ही एक-दो सीन और भी हैं। जैसे कि गुंडों की पिटाई करते समय अनिल कपूर के पीछे खड़ी एक गाड़ी पर 'मुन्ना' लिखा होता है।
Read in English: Anil Kapoor brings back memories of Tezaab’s Munna in 'Subedaar'
बेटी के रूप में राधिका मदान के दो-तीन दृश्य बेहतरीन हैं। बाप जैसी बहादुर बेटी के रूप में उन्हें जितना काम दिया गया है, उन्होंने जमकर किया है। फिल्म एक्शन और इमोशन से भरपूर है। बाप और बेटी के दो अलग-अलग संघर्ष फिल्म के अंत में जब मिलते हैं तो एक मजबूत क्लाइमेक्स उभरकर आता है। उस पर नाना पाटेकर की मेहमान भूमिका एक जोरदार तड़का लगा जाती है। फिल्म में मोना सिंह लेडी डॉन हैं। वीडियो कॉल पर अनिल कपूर को देखकर उनके 'फ्लर्ट' से पता चल जाता है कि "है यह मोना सिंह ही…"। फैजल मलिक के रूप में बॉलीवुड को एक अच्छा अभिनेता मिल गया है। विलेन के अच्छे रोल उन्हें दिए जाएं तो रंग जमा सकते हैं।
विशेष भूमिका में, अनिल कपूर की पत्नी की भूमिका में खुशबू सुंदर जब-जब स्क्रीन पर आती हैं, तो 'अचार' की सी खुशबू फैल जाती है। इस खुशबू में रोमांस का एक अलग ही 'फ्लेवर' दिखता है।
फिल्म की एक और खास बात है, और वह है आदित्य रावल की उपस्थिति। परेश रावल के बेटे आदित्य रावल बेहद खूंखार और सनकी नजर आते हैं। आगे चलकर निश्चित रूप से अपने पिता का नाम रौशन करेंगे।
फिल्म का अंत देखकर लगता है कि इसका दूसरा भाग भी आएगा। यदि अगले भाग के निर्माण का 'स्केल' यही रहे तो उसे सिनेमाघरों में भी रिलीज किया जाना चाहिए।






Related Items
सत्ता, शिक्षा और संघर्ष का तानाबाना है 'संकल्प'
महज ‘अभिनेता’ नहीं, धर्मेंद्र एक ‘जश्न’ थे...!
जोश और बलिदान से तराशी गई फिल्म है ‘काकोरी’