अकबर इलाहाबादी के समकालीनों का कहना है कि उनमें जिंदादिली इस कदर समाई हुई थी कि विकट परिस्थितियों में भी हास-परिहास का वातावरण पैदा कर देते थे और अपने रंगों से सबको सराबोर कर देते थे।
एक बार वृद्धावस्था में जब उनकी आंखों की रोशनी कुछ कमजोर हो गई तो उन्हें ऑपरेशन करवाना पड़ गया। ऑपरेशन के बाद डॉक्टर ने आंखों पर पट्टी बांधी और अपनी फीस लेकर चलता बना।
थोड़ी देर बाद साहबजादे हशरत हुसैन कमरे दाखिल हुए और अपने वालिद का हाल-चाल पूछा। ऐसे मौके पर भी अकबर इलाहाबादी परिहास करने से न चूके। उन्होंने उत्तर देते हुए अपने साहबजादे को यह शेर सुनाया-
रोशनी आये तो हम देखें कहीं अपना हिसाब,
वो तो दो सौ ले गए आंखों पे पट्टी बांध के।
अकबर इलाहाबादी एक ऐसे जिंदादिल शायर थे, जो मुर्दा दिल को भी हंसा देने का कला जानते थे। उन्होंने हास्य और व्यंग्य के जरिये समाज की खूब खबर ली। उनके व्यंग्य बेहद शिष्ट और प्रभावपूर्ण होते थे। गाहे-बगाहे वह महफिलों में जान डाल देते थे।
साल 1911 की बात है। इलाहाबाद में एक प्रदर्शनी लगाई गई थी। देश के कोने-कोने से लोग देखने आए हुए थे। मशहूर गायिका और नर्तकी गौहर जान भी तत्कालीन कलकत्ता से आई हुई थीं।
गौहर जान ने श्रोताओं से भरे हुए खचाखच हाल में अकबर की एक गजल बड़े ही अनूठे अंदाज में सुनाई। श्रोता मंत्रमुग्ध हो उठे।
अकबर इलाहाबादी के एक दोस्त ने गौहर जान की गायकी अदा पर अकबर की प्रतिक्रिया पूछी तो अकबर ने निराले ढंग का यह शेर कह सुनाया-
खुशनसीय आज कौन यहां है गौहर के सिवा'
सब कुछ अल्लाह ने दे रखा है शौहर के सिवा।






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