बस्तर आर्ट के नाम से मशहूर छत्तीसगढ़ का लौह शिल्प देश और दुनिया में न सिर्फ अपनी एक पहचान बना रहा है बल्कि लोगों के रोजगार का जरिया भी बन रहा है।
बस्तर लौह शिल्प का इतिहास काफी पुराना है। प्राचीन काल में यहां के स्थानीय लोग लोहे की गिट्टी और कोयले को जलाकर लोहा बनाया करते थे और इससे कृषि के उपयोग में आने वाले औजार व देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाई जाती थीं। समय के साथ बस्तर की कला को नई पहचान मिली और लौह शिल्पियों की यह कारीगीरी ‘बस्तर आर्ट’ देश और दुनिया में काफी लोकप्रिय हो गई।
छत्तीसगढ़ की यह लौह शिल्प सिर्फ काले रंग में बनाई जाती थी लेकिन अब इसमें दूसरे रंगों का संयोजन करके नए किस्म की कला विकसित की जा रही है। इसे काफी पसंद भी किया जा रहा है।
अब यहां के इन शिल्पकारों द्वारा परंपरागत शिल्प के अतिरिक्त बाजार की मांग के अनुरूप सजावटी व घरेलू उपयोग की सामग्रियां भी बनाई जा रही हैं। यहां के शिल्पकारों ने अपनी संस्कृति को प्रभावित किए बिना परंपरागत कला में ही उन्होंने नएपन को शामिल किया है।
हाल ही में कई शिल्पकारों को भारत सरकार की ओर से इटली, रूस, विएना सहित कई देशों में जाने का अवसर मिला, जहां उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन किया। इन शिल्पकारों ने अपनी प्रतिभा से न केवल स्थानीय कारीगरी को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई है, बल्कि अपनी आर्थिक स्थिति भी लगातार सुदृढ़ की है।






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