दुनिया

पिछले साल जब एक उम्रदराज़ ‘महान’ नेता ने शांति के लिए नोबेल प्राइज की इच्छा जाहिर की थी, तब ही समझ लेना चाहिए था कि शांति का मतलब युद्ध तनाव होता है। यह वही दोहरी ज़ुबान है, जिसे जॉर्ज ऑरवेल ने ‘डबलस्पीक’ कहा था, जो अब उस लोकतंत्र की पहचान बन चुकी है, जिसने ताक़त और डर को अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया है...

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क्यों ठंडा पड़ गया वह जोश? जो डोनाल्ड ट्रंप 24 घंटे में अमन का वादा करता था, उनके पास दूसरे साल में ही अल्फ़ाज़ क्यों कम पड़ गए? क्या शोर-शराबा ही नीति था, अकड़ को ही कूटनीति समझ लिया गया, या बिना नक़्शे की तोड़-फोड़ ही सब कुछ थी? और सबसे बड़ा सवाल, क्या दुनिया अब प्रभावित होना बंद कर चुकी है...

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दिल्ली की कड़कड़ाती सर्दी अचानक कुछ हल्की पड़ गई, जब व्लादिमीर पुतिन का विमान उतरा और राजधानी ‘पुतिन यात्रा’ की राजनीतिक गर्माहट में नहा उठी। दिसंबर की ठिठुरन ही नहीं टूटी—भारत-रूस की पुरानी दोस्ती भी नई चमक के साथ दुनिया के सामने उभरी, जैसे भारत आत्मविश्वास के साथ वैश्विक नेतृत्व की केंद्र-पट्टी पर वापस लौट आया हो...

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क्या भारत फिर इतिहास को दोहराते हुए खामोश तमाशबीन बना रहेगा? क्या हम सचमुच बांग्लादेश को एक और पाकिस्तान में तब्दील होते देखने का इंतज़ार कर रहे हैं, उस मोड़ तक, जहां से वापसी नामुमकिन हो जाती है...

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पश्चिमी दुनिया की राजनीति एक रंगमंच बन चुकी है, जहां लोकतंत्र का मुखौटा पहनकर साम्राज्यवाद का नंगा नाच होता है। मानवाधिकारों की दुहाई देने वाले खुद युद्ध के सौदागर हैं। कहते हैं शांति, करते हैं तबाही, और परिणाम होता है एक डील, फायदे का सौदा। क्या यही है सभ्यता का पश्चिमी मॉडल — झूठ, छल और पाखंड का गठबंधन…?

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पाकिस्तान आज एक नाज़ुक मोड़ पर खड़ा हुआ है। इसका भविष्य आंतरिक कमज़ोरियों और बाहरी दबावों के जाल में कस कर उलझ गया है।

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