राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के नाम पर परिवारों, खासकर बेटियों को निशाना बनाना लोकतंत्र नहीं, सामाजिक पतन का संकेत है।
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राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के नाम पर परिवारों, खासकर बेटियों को निशाना बनाना लोकतंत्र नहीं, सामाजिक पतन का संकेत है।
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कुछ दिन पहले दक्षिण भारत के एक छोटे शहर में दीप कुमार जो एक स्वयंसेवी संगठन चलाते हैं, से मुलाकात हुई। मोदी की वजह से उनके द्वारा दलित उत्थान के कार्य में मुश्किलें आएंगी। उनकी चिंता है कि 30-40 लोगों के स्टाफ को कहां से सैलरी देंगे, कैसे वाहन चलेंगे। दीप कुमार के जैसे अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं को फॉरेन कंट्रीब्यूशन कानून में संशोधनों से बहुत वेदना है, आक्रोश है...
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क्रिकेट मैच देखने के लिए टिकट खरीदने से आप क्रिकेटर नहीं बन सकते, वोट डालने से नेताजी नहीं बन सकते, लाल टोपी पहनने से क्रांतिकारी नहीं हो सकते, सिर्फ शादी होने से बाप नहीं कहलाए जा सकते, तो फिर पासपोर्ट बनवाने से भारतीय नागरिक कैसे?
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नई दिल्ली का जंतर-मंतर बगावत के एक रंगीन मेले में बदल गया। जेन ज़ी के नौजवान गा रहे थे, नाच रहे थे, मीम्स बना रहे थे, ताकतवर नेताओं का मज़ाक उड़ा रहे थे और बर्गर, पिज़्ज़ा, भटूरे खाते हुए ऐसे मस्ती कर रहे थे, मानो राजनीति किसी कॉलेज फेस्ट में आ घुसी हो।
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आख़िर नालियां किसने खोलीं? हर चुनाव, हर धरना, हर इस्तीफा और हर सियासी पुनर्जन्म के साथ वही जानी-पहचानी खड़खड़ाहट फिर सुनाई देती है। रोशनी मंद पड़ती है। कैमरे बंद हो जाते हैं। दिल्ली की चमचमाती इमारतों के नीचे कहीं कोई मुस्कुराता है। मैनहोल का ढक्कन धीरे-धीरे उठता है। और एक खुशमिजाज़ आवाज़ फुसफुसाती है, "फिक्र मत कीजिए... इंटरवल खत्म हो गया है!"
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देश इस समय महंगाई, बेरोजगारी, प्रदूषण और बुनियादी ढांचे जैसी बड़ी चुनौतियों से जूझ रहा है। लेकिन, इसी बीच, कक्षा 9 की कला शिक्षा की पुस्तक ‘मधुरिमा’ ने एक ऐसा विवाद खड़ा कर दिया, जिसने शिक्षा, इतिहास और संस्कृति पर नई बहस छेड़ दी...
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एक तरफ़ देश में एक्सप्रेसवे, मेट्रो, एयरपोर्ट और डिजिटल क्रांति की नई इबारत लिखी जा रही है। दूसरी तरफ़ समाज का एक बड़ा हिस्सा अब भी सदियों पुराने पूर्वाग्रहों और सामंती सोच की जंजीरों में जकड़ा हुआ है...
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साल 1947 का विभाजन भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा ज़ख्म है। लाखों लोग बेघर हुए। अनगिनत परिवार बिछड़ गए। नफ़रत की आग में पूरा उपमहाद्वीप झुलस गया। आज भी उस दौर की कहानियां सुनकर रूह कांप उठती है...
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हमारे खूबसूरत मुल्क में चुनाव ऐसे आते हैं जैसे शादी, क्रिकेट फाइनल और पौराणिक धारावाहिक सबको मिलाकर एक विशाल सर्कस बना दिया गया हो। लाउडस्पीकर चीखते हैं। हेलिकॉप्टर फूल बरसाते हैं। टीवी एंकर अपनी आवाज़ खो बैठते हैं। और नेता लोग वादे ऐसे बांटते हैं जैसे भंडारे में हलवा पूरी...
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हार भी अजीब चीज़ होती है। किसी को समझदार बना देती है। किसी को और ज़्यादा गुस्सैल। कोई हारकर चुपचाप अपने टूटे घर की ईंटें जोड़ता है। कोई हार के बाद भी चौराहे पर खड़े होकर दुनिया को गालियां देता रहता है...
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