संपादकीय

साल 1947 का विभाजन भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा ज़ख्म है। लाखों लोग बेघर हुए। अनगिनत परिवार बिछड़ गए। नफ़रत की आग में पूरा उपमहाद्वीप झुलस गया। आज भी उस दौर की कहानियां सुनकर रूह कांप उठती है...

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हमारे खूबसूरत मुल्क में चुनाव ऐसे आते हैं जैसे शादी, क्रिकेट फाइनल और पौराणिक धारावाहिक सबको मिलाकर एक विशाल सर्कस बना दिया गया हो। लाउडस्पीकर चीखते हैं। हेलिकॉप्टर फूल बरसाते हैं। टीवी एंकर अपनी आवाज़ खो बैठते हैं। और नेता लोग वादे ऐसे बांटते हैं जैसे भंडारे में हलवा पूरी...

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हार भी अजीब चीज़ होती है। किसी को समझदार बना देती है। किसी को और ज़्यादा गुस्सैल। कोई हारकर चुपचाप अपने टूटे घर की ईंटें जोड़ता है। कोई हार के बाद भी चौराहे पर खड़े होकर दुनिया को गालियां देता रहता है...

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कांग्रेस-मुक्त भारत! यह नारा आज के राजनीतिक गलियारों में गूंजता है। पर इसकी पहली आहट बहुत पहले सुनाई दी थी। एक बाग़ी दिमाग में। एक बेचैन आत्मा में। डॉ राम मनोहर लोहिया के भीतर।

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क्या सचमुच भारत में चुनाव जीतने के लिए जाति का प्रमाण पत्र ही असली पासपोर्ट है? सवाल चुभता है, पर जवाब बहुतों को मालूम है। सच यह है कि हां, आज भी काफी हद तक यही हकीकत है। लोकतंत्र का मैदान खुला है, पर खेल के नियम अब भी पुरानी पहचानें तय करते हैं।

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हालिया घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत का लोकतांत्रिक ढांचा, अपनी अव्यवस्था और उलझनों के बावजूद, अमेरिका की सख्त और कुछ हद तक जड़ प्रणाली से ज्यादा जवाबदेह और नुमाइंदगी करने वाला है...

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