संपादकीय

देश इस समय महंगाई, बेरोजगारी, प्रदूषण और बुनियादी ढांचे जैसी बड़ी चुनौतियों से जूझ रहा है। लेकिन, इसी बीच, कक्षा 9 की कला शिक्षा की पुस्तक ‘मधुरिमा’ ने एक ऐसा विवाद खड़ा कर दिया, जिसने शिक्षा, इतिहास और संस्कृति पर नई बहस छेड़ दी...

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एक तरफ़ देश में एक्सप्रेसवे, मेट्रो, एयरपोर्ट और डिजिटल क्रांति की नई इबारत लिखी जा रही है। दूसरी तरफ़ समाज का एक बड़ा हिस्सा अब भी सदियों पुराने पूर्वाग्रहों और सामंती सोच की जंजीरों में जकड़ा हुआ है...

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साल 1947 का विभाजन भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा ज़ख्म है। लाखों लोग बेघर हुए। अनगिनत परिवार बिछड़ गए। नफ़रत की आग में पूरा उपमहाद्वीप झुलस गया। आज भी उस दौर की कहानियां सुनकर रूह कांप उठती है...

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हमारे खूबसूरत मुल्क में चुनाव ऐसे आते हैं जैसे शादी, क्रिकेट फाइनल और पौराणिक धारावाहिक सबको मिलाकर एक विशाल सर्कस बना दिया गया हो। लाउडस्पीकर चीखते हैं। हेलिकॉप्टर फूल बरसाते हैं। टीवी एंकर अपनी आवाज़ खो बैठते हैं। और नेता लोग वादे ऐसे बांटते हैं जैसे भंडारे में हलवा पूरी...

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हार भी अजीब चीज़ होती है। किसी को समझदार बना देती है। किसी को और ज़्यादा गुस्सैल। कोई हारकर चुपचाप अपने टूटे घर की ईंटें जोड़ता है। कोई हार के बाद भी चौराहे पर खड़े होकर दुनिया को गालियां देता रहता है...

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कांग्रेस-मुक्त भारत! यह नारा आज के राजनीतिक गलियारों में गूंजता है। पर इसकी पहली आहट बहुत पहले सुनाई दी थी। एक बाग़ी दिमाग में। एक बेचैन आत्मा में। डॉ राम मनोहर लोहिया के भीतर।

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