बहुत से गीत ऐसे हैं जिनके मुखड़े बातचीत करते, सड़क पर चलते, यूं ही अधरों से फिसल जाते हैं। बाद में मुखड़े को आगे बढाकर पूरा गीत ही बन जाता है। जैसे साल 1955 में आई फिल्म 'श्री 420' के गाने 'मुड़-मुड़ के ना देख मुड़-मुड़ के' के जन्म की कहानी है। गीतकार शैलेंद्र ने तब नई-नई कार खरीदी थी। अपने दोस्तों को लेकर वह सैर पर निकले। लाल बत्ती पर कार रुकी, तभी एक लड़की कार के पास आकर खड़ी हो गई। कार में बैठे सभी उसे कनखियों से निहारने लगे। बत्ती हरी हुई तो कार चल पड़ी।
Read More




