पर्यावरण / मौसम

मथुरा में यमुना किनारे शाम ढल रही है। आरती की घंटियां बज रही हैं, अगरबत्तियां जल रही हैं, पुजारी मंत्रोच्चार कर रहे हैं, और सैकड़ों श्रद्धालु पवित्रता व मोक्ष की कामना में एकत्र हैं। लेकिन, गेंदा फूलों की महक के उस पार एक कड़वी हक़ीक़त है, प्लास्टिक कचरा यमुना में तैर रहा है, रासायनिक झाग डरावने अंदाज़ में चमक रहे हैं, और यह नदी, जो करोड़ों लोगों की जीवनरेखा है, उपेक्षा के बोझ तले कराह रही है। यही दृश्य गंगा, कावेरी, नर्मदा के किनारों पर देखने को मिल सकते हैं...

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भारत का नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र एक नए रूपान्‍तरकारी चरण में प्रवेश कर रहा है, जो न केवल क्षमता वृद्धि की गति से बल्कि इसकी प्रणालियों की मजबूती, स्थिरता और गहनता से भी परिभाषित होगा। एक दशक के रिकॉर्ड विस्तार के बाद, अब फोकस मज़बूत, वितरण योग्य और लचीली स्वच्छ ऊर्जा संरचना के निर्माण पर केंद्रित है जो 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म क्षमता प्राप्त करने के देश के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक हो सके...

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राजस्थान के रेगिस्तान को बढ़ने से रोकने और हरियाली बढ़ाने में इंदिरा गांधी नहर और बेहतर जल प्रबंधन ने अहम भूमिका निभाई है। इस परियोजना ने थार के रेगिस्तान में पानी पहुंचाकर कृषि योग्य भूमि बढ़ाई, वनाच्छादन को प्रोत्साहित किया और स्थानीय वर्षा दर में सुधार किया है।

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भारत में भारी बारिश से हुई त्रासदी ने अपना कहर बरपाया है। आगरा के ऐतिहासिक ताज महल से लेकर मथुरा-वृंदावन की पवित्र भूमि तक, यमुना नदी अपने किनारों से उफनकर बाहर निकली है, जिससे भारी तबाही हुई है। यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि मानवजनित विनाश है।

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हवा में मौजूद रोगाणु यानी फेफड़ों, आंतों, मुंह और त्वचा में संक्रमण पैदा करने वाले बैक्टीरिया, दिल्ली के घनी आबादी वाले इलाकों में कम भीड़-भाड़ वाले इलाकों की तुलना में दोगुने से ज़्यादा हैं...

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दिल्ली की जाम नालियां, मुंबई के कचरे से पटे समुद्र तट, हिमालय की पगडंडियों पर बिखरे रैपर, वाराणसी और वृंदावन के घाटों पर तैरती बोतलें और माला… आज भारत का हर कोना प्लास्टिक से घिरा है। यह जहरीला बोझ मिट्टी को बंजर बना रहा है, नदियों का दम घोंट रहा है, जानवरों की जिंदगी छीन रहा है और पवित्र स्थलों की आभा धूमिल कर रहा है...

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