दुनिया में जलवायु सम्मेलनों की धूम मची हुई है। विद्यार्थी निबंध लिख रहे हैं। मंच सजे हैं। संकल्प पढ़े जा रहे हैं। तालियां बज रही हैं। लेकिन, धरती तप रही है। हवा में जहर घुल रहा है। मौसम का मिज़ाज बिगड़ चुका है...
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दुनिया में जलवायु सम्मेलनों की धूम मची हुई है। विद्यार्थी निबंध लिख रहे हैं। मंच सजे हैं। संकल्प पढ़े जा रहे हैं। तालियां बज रही हैं। लेकिन, धरती तप रही है। हवा में जहर घुल रहा है। मौसम का मिज़ाज बिगड़ चुका है...
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पिछले दिनों, नई दिल्ली में एआई शिखर सम्मेलन की चकाचौंध रही। दुनियाभर के विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं और टेक कंपनियों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के भविष्य पर मंथन किया। मंच पर ‘डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन’ की बातें हुईं। ऐप्प, क्लाउड और स्मार्ट प्लेटफॉर्म की चर्चा हुई। लेकिन, इसी डिजिटल उछाल के साथ एक नया संकट भी लगातार गहरा रहा है। हर नई तकनीक, हर अपग्रेड, हर नया डिवाइस… पीछे छोड़ जाता है, ई-कचरे का एक और ढेर।
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कभी जिसके तट पर बंसी बजी थी, आज वहीं सन्नाटा है। कभी जिसके जल में आस्था डुबकी लगाती थी, आज वही जल ज़हर बन चुका है। ब्रज मंडल की जीवनरेखा कही जाने वाली यमुना आज अपने अस्तित्व की जंग लड़ रही है। नदी नहीं, नाला दिखती है। पानी नहीं, काला, बदबूदार, झाग से भरा तरल बहता है। तस्वीरें चीख रही हैं। सच सामने है। सवाल सिर्फ एक है कि क्या हम सचमुच यमुना को बचाना चाहते हैं?
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टाइम मशीन में बैठकर लौटते हैं पौराणिक काल में और देखते हैं, गोकुल में यमुना किनारे फैला एक हरा-भरा वन। ऊंचे-ऊंचे वृक्षों की छांव में मोर पंख फैलाए नाच रहे हैं, रंग-बिरंगी तितलियां हवा में रेशमी नक़्श बनाती उड़ रही हैं, गायें शांति से चर रही हैं, हिरण चौकड़ी भरते दौड़ रहे हैं। कदंब के पेड़ तले श्रीकृष्ण अपनी बांसुरी की मधुर तान छेड़ते हैं और गोपियां मानो किसी रूहानी जादू में डूबी झूम उठती हैं। पूरा ब्रज जैसे संगीत, प्रकृति और भक्ति का एक जीवंत स्वर्ग हो...
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क्या भारत की हजारों छोटी नदियों को अपनी पहचान खोकर कूड़े के नीचे दब जाने, सीवर में बदल जाने या अतिक्रमण की चादर ओढ़ लेने दिया जाएगा? यह सवाल अब केवल पर्यावरणविदों का ही नहीं रहा, बल्कि देश के भविष्य, जल-सुरक्षा और सभ्यतागत अस्तित्व का भी बन चुका है...
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कर्नाटक हाईकोर्ट का ताज़ा फैसला कोई साधारण कानूनी टिप्पणी नहीं है। यह शासन व्यवस्था की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट है। अदालत ने दो टूक शब्दों में स्वीकार किया है कि अवैध रेत खनन पर राज्य का कोई नियंत्रण नहीं बचा है। कानून थक चुका है। प्रशासन ने हथियार डाल दिए हैं। राजनीति ने आंखें मूंद ली हैं...
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