साहित्य / मीडिया

बांग्ला भाषा के सुप्रसिद्ध कवि और नाटककार गिरीश चन्द्र घोष के एक अच्छे दोस्त थे, जो बड़े रईस थे पर उनमें सौजन्यता नाम की कोई चीज नहीं थी। सदा पैसे के दर्प से चूर रहते थे।

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उन दिनों आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी शांति निकेतन में थे। उस समय उनके पास एक कार भी थी। मगर वह उसे बहुत धीमे चलाते थे। उसकी चाल इतनी धीमी होती कि साथ में बैठने वाले की तबीयत ऊब जाती थी। फिर भी द्विवेदी जी अपने आगंतुकों को अपनी गाड़ी से सैर जरूर कराते थे।

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मशहूर साहित्यकार और शिक्षाविद आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के बारे में यह बात प्रसिद्ध थी कि वह बहुत ही कम बोलते थे। किसी भी बड़ी से बड़ी समस्या को वह एक या दो शब्दों में ही समाप्त कर देते थे।

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अकबर इलाहाबादी के समकालीनों का कहना है कि उनमें जिंदादिली इस कदर समाई हुई थी कि विकट परिस्थितियों में भी हास-परिहास का वातावरण पैदा कर देते थे और अपने रंगों से सबको सराबोर कर देते थे।

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शायर इकबाल अपनी जिन्दगी में एक बहुत ही खुशमिजाज और जिंदादिल इनसान थे। हर महफिल में उनकी वाकपटुता और शायरी रंग ला देती थी।

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बहुत से लेखकों के बारे में मशहूर है कि वे किसी खास कागज पर लिखते हैं या फलां मूड में लिखते हैं या फिर किसी विशेष किस्म की कलम से लिखते हैं। मगर, उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद इस दिखावटी ताम-झाम से सर्वथा दूर थे।

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