फरीदाबाद : स्थानीय सेक्टर 29 के सनातन धर्म मंदिर में संस्कार भारती द्वारा आयोजित मासिक कार्यक्रम के तहत "काव्य कल्लोल" गोष्ठी का आयोजन किया गया।
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फरीदाबाद : स्थानीय सेक्टर 29 के सनातन धर्म मंदिर में संस्कार भारती द्वारा आयोजित मासिक कार्यक्रम के तहत "काव्य कल्लोल" गोष्ठी का आयोजन किया गया।
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14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। वर्ष 1949 में इसी तारीख को संविधान सभा ने एक लंबी और सजीव बहस के बाद देवनागरी लिपि में हिंदी को भारतीय संघ की राजभाषा के रूप में अपनाया था। भारतीय संविधान के भाग XVII के अनुच्छेद 343 से 351 तक इसी विषय के बारे में है। अनुच्छेद 343 (1) में यह घोषणा की गई है कि देवनागरी लिपि में हिंदी संघ की राजभाषा होगी। लेकिन, अनुच्छेद 343 (2) और उसके बाद के अनुच्छेदों को पढ़ने से पता चलता है कि भारत जैसे बहुभाषी राष्ट्र में राजभाषा के मुद्दे को बहुत कठिन और जटिल रास्ते से होकर गुजरना है क्योंकि देश के सरकारी संस्थानों में अंग्रेजी में निर्धारित कानूनों, नियमों और विनियमों का ही वर्चस्व है।
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भारत दुनिया के उन अनूठे देशों में से एक है जहां भाषाओं में विविधता की विरासत है। भारत के संविधान ने 22 आधिकारिक भाषाओं को मान्यता दी है। बहुभाषावाद भारत में जीवन का मार्ग है क्योंकि देश के विभिन्न भागों में लोग अपने जन्म से ही एक से अधिक भाषा बोलते हैं और अपने जीवनकाल के दौरान अतिरिक्त भाषाओं को सीखते हैं। (Read in English)
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नई दिल्ली : मुंशी प्रेमचंद के 'हंस' के पुनर्संस्थापक राजेन्द्र यादव की जयंती पर चौथे 'राजेंद्र यादव हंस कथा सम्मान 2016' का आयोजन इंडिया इंटरनेशनल सेंटर एनेक्सी सभागार में किया गया। इस बार का यह प्रतिष्ठित सम्मान-पुरस्कार प्रतिभाशाली युवा पत्रकार-कथाकार योगिता यादव और पंकज सुबीर को संयुक्त रूप से प्रदान किया गया। दोनों रचनाकारों को सम्मानस्वरूप 11-11 हजार रुपये की राशि और शॉल प्रदान किया गया। यह सम्मान ‘हंस’ में प्रकाशित किसी कहानी पर प्रदान किया जाता है।
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कवि-कथाकार राजेंद्र आहुति के 'वाक्यांश' (कविता-संग्रह) को पढ़ते हुए एक सुखद रचनात्मक अनुभूति होती है। रोजमर्रा के जीवन से कदमताल करते, जीवन की कठिनाईयों और सच्चाईयों से मुठभेड़ करते हुए राजेंद्र आहुति कविता लिखते हैं। उनकी गहन अनुभूति से उपजी कविताएं इस मामले में बेपरवाह हैं कि कविता को आप कैसे देखते-समझते हैं! वह आपकी अनुभूति हो सकती है! कवि प्रयोगधर्मी है। रूप और अन्तर्वस्तु के अकादमिक विमर्श से अलग अपनी राह चलते रहने को प्रस्तुत...
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दुनिया में जब भी किसी ऐसे आंदोलन को याद करते हैं जिन आंदोलनों में मनुष्य अपने ऊपर थोपे गए कई बंधनों से मुक्ति के लिए एकजूट होता है तो उस आंदोलन का कोई न कोई गीत याद आने लगता है। यही वास्तविकता है कि कोई भी आंदोलन गीतों के बिना पूरा नहीं होता है। काव्य धारा के कई रूप हैं और वे कविता, नज्म़, गज़ल, गीत आदि के रूप में जाने जाते हैं। बल्कि यूं भी कहा जाए कि नारे भी अपनी काव्यत्मकता से ही यादगार बन पाते हैं। ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ आंदोलनों के लिए न मालूम कितने गीत लिखे गए। इस विषय पर कई शोध हुए हैं लेकिन तमाम तरह के शोधों के बावजूद ये लगता है कि वे उस दौरान लिखे गए सभी गीतों को समेट नहीं पाए।
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