अहा, आनंद लें असली भारतीय पल का! आप लेट हैं। फैशनेबली लेट नहीं। बॉलीवुड हीरो की एंट्री वाली लेट नहीं। बल्कि सही मायने में, ट्रैजिकली, “हे भगवान, बॉस मुझे नौकरी से निकाल ही देगा” वाली लेट।
Read More
अहा, आनंद लें असली भारतीय पल का! आप लेट हैं। फैशनेबली लेट नहीं। बॉलीवुड हीरो की एंट्री वाली लेट नहीं। बल्कि सही मायने में, ट्रैजिकली, “हे भगवान, बॉस मुझे नौकरी से निकाल ही देगा” वाली लेट।
Read More
प्यार अंधा होता है, यह कहावत पुरानी है। पर अब प्यार खून भी करने लगा है, यह नया सच है। आगरा की एक घटना ने दिल दहला दिया। एक मां ने अपनी ही मासूम बच्ची को मार डाला। वजह गुस्सा नहीं थी, गरीबी नहीं थी। वजह था एक नया रिश्ता। बच्ची “रास्ते की दीवार” बन गई थी। सवाल सीधा है। क्या अब रिश्ते बोझ बनते जा रहे हैं...
Read More
देशभर में रेलवे स्टेशनों पर आमूल-चूल बदलाव देखा जा रहा है। इस बदलाव के माध्यम से स्थानीय शिल्प कौशल को रोजमर्रा की यात्राओं के केंद्र में लाया जा रहा है।
Read More
कभी मोहब्बत बगावत हुआ करती थी। घर से लड़ाई। समाज से टकराव। फिल्मी अंदाज़ में, “प्यार किया तो डरना क्या!” लड़का-लड़की भागकर शादी कर लेते थे। कोर्ट में दो गवाह। या आर्य समाज मंदिर में सात फेरे। ना बैंड, ना बाजा, ना बारात। बस दिल की जिद। मां-बाप सालों तक रूठे रहते। मोहल्ले में कानाफूसी चलती रहती थी। पर इश्क में एक आग होती थी। एक दीवानगी। अब तस्वीर बदल गई है।
Read More
उस रात सब कुछ आम था। सड़क पर हल्की रौशनी, पास की चाय की दुकान से उठती अदरख की महक, और घर लौटती एक लड़की, जिसकी बस एक ही ख्वाहिश थी, कोई उसे उसके हाल पर छोड़ दे। पीछे से क़दमों की आहट आई। कुछ सेकेंड। एक चीख। फिर सन्नाटा। चेहरे पर तेज़ाब जैसा कुछ फेंका गया, इतनी तेज़ी से कि ज़िंदगी फौरन दो हिस्सों में बंट गई, हमले से पहले और हमले के बाद। यह कोई कहानी नहीं बल्कि आज के भारत की हक़ीकत है।
Read More
एक व्यस्त चौराहा। लाल बत्ती जलती है। इंजन रुकते हैं। एसी की ठंडी हवा के भीतर बैठे लोग मोबाइल देखने लगते हैं। और तभी हीरा आ जाती है। चमकीली साड़ी। सलीके से बंधे बाल। होंठों पर गाढ़ी लिपस्टिक। आंखों में तेज। उम्र कम, हौसला बड़ा। वह अपनी खास, पहचानी हुई ताली बजाती है। शीशे पर हल्की दस्तक देती है। मुस्कराकर कहती है, “खुश रहो बाबू… तरक्की करो…”।
Read More
आगरा कैंट रेलवे स्टेशन के आसपास या यमुना किनारा रोड पर आपने छोटे-छोटे बच्चों को कबाड़ा प्लास्टिक बीनते जरूर देखा होगा। हर कुछ मिनट बाद वे कपड़े में भिगोया गया कोई केमिकल सूंघते हैं, जैसे वही उनकी भूख हो, वही उनका सुकून। शहर के नामी स्कूलों के इर्द-गिर्द ‘पुड़िया गैंग’ की फुसफुसाहटें हैं। शादी हो या बर्थडे पार्टी, बीयर और दारू अब रिवाज़ बन चुके हैं। कोई खांसी का सिरप गटक रहा है, कोई जर्दा, टिंक्चर या सुलोचन की बोतल। तन-बदन बेहाल, आंखें सूनी, दिमाग खिसका या भटका हुआ, नालियों और कूड़े के ढेरों में भविष्य तलाशती यह पीढ़ी आखिर किस दिशा में जा रही है?
Read More
रेगिस्तान की ख़ामोशी हो या आसमान की चमकती रोशनी, इंसान सदियों से यह सवाल पूछता आया है कि क्या हम इस कायनात में अकेले हैं...
Read More
पिछले दिनों, एक दोपहर, महिलाओं से लगभग पूरी सी भरी बस के बाहर मैं पांच मिनिट से खड़ा था, तभी कंडक्टर आया, इशारा किया “घुसो!” मैं झिझक रहा था, पूरी बस महिलाओं से भरी थी, सिर्फ मैं अकेला पुरुष, लेडीज स्पेशल बस तो नहीं! कंडक्टर ने एक लड़की को उठाकर मुझे सीट पर बैठाया, अटपटा लगा, लेकिन सीनियर सिटीजन के प्रति सम्मान देखकर, मुझे अच्छा लगा। बगल की सीट पर बैठी महिला ने बातचीत में बताया कि ज्यादातर सरकारी बसों में आजकल महिलाएं ही अधिक संख्या में दिखेंगी...
Read More
काफी समय तक बुद्धिलब्धि, यानी आईक्यू, का स्कोर पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ता रहा है। इस प्रवृत्ति को 'फ्लिन प्रभाव' कहा जाता है। लेकिन, हाल के वर्षों में शोधकर्ताओं ने कुछ अलग ही रंग देखा है। नई पीढ़ियां, खासकर जेन-जी, उसी उम्र में मिलेनियल और बूमर्स की तुलना में कम अंक ला रही हैं। क्यों...
Read More