ब्रजभूमि पर है वह टीला जहां ध्रुव ने की थी ‘अटल’ तपस्या'

भगवान श्रीकृष्ण की नगरी मथुरा में एक ऐसा स्थान भी है, जहां भक्त ध्रुव ने अपनी अटल तपस्या की थी। मथुरा से करीब 10 किलोमीटर दूर नेशनल हाईवे-2 से होते हुए आप महोली गांव की तरफ बढ़ेंगे तो राह में आपको प्राचीन ध्रुव टीला मिलेगा। बड़े-बड़े पत्थर और मिट्टी के ढेर से बने इस टीले की लंबाई करीब 200 फुट और ऊंचाई करीब 150 फुट है। माना जाता है ध्रुव ने यहीं पर भगवान नारायण का आह्वान किया था।

यहां मौजूद ध्रुव मंदिर के सेवायत नारायण दास बताते हैं कि नारद मुनि के कहने पर ध्रुव इस स्थान पर पांच साल की अवस्था में आए थे और इसी टीले पर आकर उन्होंने तपस्या की। लगभग छह माह की तपस्या के बाद भगवान विष्णु ने ध्रुव से प्रसन्न होकर उनको दर्शन दिए। इस मंदिर में नारायण भगवान, ध्रुव और नारद मुनि की प्रतिमा लगी हुई है। इस टीले के चारों ओर एक घना जंगल है।

प्रचलित कथा के अनुसार, मनु और शतरूपा के पुत्र उत्तानपाद की दो रानियां थीं, सुनीति और सुरुचि। राजा का सुरुचि से अधिक प्रेम था। सुरुचि के पुत्र  का नाम उत्तम और सुनीति के पुत्र का नाम ध्रुव था।

एक दिन उत्तानपाद सुरुचि के पुत्र उत्तम को गोद में बिठाकर प्यार कर रहे थे। उसी समय बालक ध्रुव वहां आ गया और उसने भी अपने पिता की गोद में बैठना चाहा। लेकिन, घमण्डी सुरुचि ने ध्रुव को महाराज की गोद में आने का यत्न करते देख उसका अपमान कर दिया। जब उसके पिता चुपचाप यह सब देखते रहे तो बालक ध्रुव रोता हुआ अपनी मां के पास आया। मां ने पुत्र ध्रुव को सबका चिन्तन छोड़कर नारायण का भजन करने के लिए कहा। मां के वचन सुनकर उनमें वैराग्य का भाव आ गया और वह तपस्या के लिए वन की ओर चल दिए। श्रीमद भागवत पुराण में इस कथा का उल्लेख आता है।

विद्वान इसका सुंदर आध्यात्मिक भाव भी बताते हैं। उनका मानना है कि उत्तानपाद का अर्थ है ‘जिसका सिर नीचे और पैर ऊपर’ हैं। जैसे, मां के गर्भ में जीव होता हैं। हम सब जीव उत्तानपाद हैं। सुरुचि का अर्थ हैं हमारा ‘मन’ और सुनीति का अर्थ हैं ‘बुद्धि’। उत्तानपाद सुरुचि की बात तो मानते थे लेकिन सुनीति की अनदेखी करते थे।

ध्रुव की कहानी हमें बताती है कि हम सब भी मन यानी सुरुचि के अनुरूप काम करते हैं जबकि हमें बुद्धि यानी सुनीति के अनुसार सोच-समझकर काम करना चाहिए। यही कारण हैं जब हम मन के अनुरूप काम करते हैं तो हमें उत्तम फल मिल जाता हैं। लेकिन, यदि हम बुद्धि से सोच-समझकर काम करते हैं तो हमें ध्रुव फल मिलेगा।

चौरासी कोस की परिक्रमा का पहला पड़ाव इसी ध्रुव टीले से शुरू होता है। यह कृष्ण की धरती पर मौजूद कई धार्मिक और आध्यात्मिक स्थानों में से एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। यहां वर्षभर भक्तों का आवागमन जारी रहता है।


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