भारत में हिंदुत्व का साम्राज्य स्थापित करने के लिए पहली आवश्यकता है जातिवादी प्रथा को जड़ मूल से नष्ट करना। इस दिशा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अन्य हिंदूवादी संगठन अयोध्या में बाबरी मस्जिद विवाद के बाद से ही सक्रिय हो गए थे जिसका परिणाम चुनावों में देखने को भी मिला है।
आजकल पूरे भारत में हर तीज त्योहार जोरदारी से मनाया जा रहा है। इनमें सभी वर्गों की भागीदारी बढ़ी है। खासकर, परिक्रमाओं, कांवर यात्राओं, जयंतियां, मेले, तमाशों, कीर्तन, कथा भागवत आयोजनों व भंडारों आदि में उपेक्षित समूहों की हिस्सेदारी बेतहाशा बढ़ी है। हिंदुत्व की विचारधारा से जुड़े संगठन अब काफी सक्रिय हो चुके हैं और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का भी भरपूर उपयोग कर रहे हैं। जमीनी स्तर पर गौ हत्या, धर्म परिवर्तन और लव जिहाद के मामलों के खिलाफ में इन समूहों की निगरानी और सक्रियता बढ़ी है।
आम जन मानस के हृदय में यह बात बैठा दी गई है कि तुष्टिकरण की राजनीति ने राष्ट्र को काफी नुकसान पहुंचाया है। जातियों के आधार पर समाज के विघटन से देश कमजोर हुआ है, इसलिए भविष्य में राजनीति खुलकर ध्रुवीकरण आधारित होगी।
यह सही है कि हजारों वर्षों से चल रहे जातिवाद ने भारत को आर्थिक और राजनैतिक शक्ति के रूप में कभी उभरने नहीं दिया है। घुसपैठिए और आक्रामक लुटेरे आते रहे और सामाजिक विभाजन का फायदा उठाते रहे। गुलामी की आदत बन गई, सांस्कृतिक और धार्मिक विध्वंश होता रहा। आजादी के बाद भी कुछ राजनैतिक दलों ने यह खेल जारी रखा। जातियों के नाम पर पार्टियां बनीं। क्षेत्रीय जातिगत ठेकेदारों ने सामाजिक खाइयों को और चौड़ा करने के अवसर भुनाए और सत्ता हथियाई।
हिंदुत्व की राजनैतिक विचारधारा को सशक्त बनाने के लिए जातिवाद का मकड़जाल तोड़ना ही होगा। जाति व्यवस्था ने ऐतिहासिक रूप से भारत के विभिन्न समुदायों को हाशिए पर धकेल दिया है। इन जातिगत बाधाओं को कम करने की आवश्यकता केवल सामाजिक न्याय के बारे में नहीं है बल्कि यह हिंदुओं और हिंदुत्व विचारधारा के एकीकरण के लिए भी आवश्यक है।
समाजवादी विचारकों ने हमेशा माना है कि जाति व्यवस्था लोकतंत्र और समानता के आदर्शों के विपरीत है। इसीलिए, डॉ लोहिया ने जाति तोड़ो सम्मेलनों की श्रृंखला शुरू की। समाजवाद विशेषज्ञ राम किशोर कहते हैं कि जाति-आधारित भेदभाव को कम करने के उद्देश्य से विधायी उपायों के बावजूद, गहरी जड़ें जमाए हुए सामाजिक प्रथाएं असमानता को कायम रखती हैं। हाशिए पर पड़े समुदायों को सशक्त बनाना और उन्हें मुख्यधारा में एकीकृत करना केवल एक नैतिक दायित्व नहीं है बल्कि यह राष्ट्र निर्माण के लिए भी महत्वपूर्ण है। एक समाज जो अपने सबसे कमजोर सदस्यों का उत्थान नहीं कर सकता, वह सामाजिक और राजनीतिक दोनों रूप से कमजोर होता है।
हिंदुत्व विचारधारा को सहिष्णुता और स्वीकृति पर आधारित एक आख्यान अपनाने के लिए, उसे जाति व्यवस्था द्वारा खड़ी की गई बाधाओं को खत्म करने की दिशा में सक्रिय रूप से काम करना होगा। तथाकथित निचली जातियों के सम्मान और अधिकारों को स्वीकार करने से न केवल समावेशी माहौल को बढ़ावा मिलता है, बल्कि सांप्रदायिक सद्भाव भी मजबूत होता है, जो राष्ट्रीय अखंडता के लिए आवश्यक है।
प्रो पारस नाथ चौधरी का कहना है कि सामाजिक एकीकरण को उत्प्रेरित करने वाले सबसे प्रभावशाली सुधारों में से एक अंतर-जातीय विवाहों को बढ़ावा देना है। ये जुड़ाव पारंपरिक मानदंडों को चुनौती दे सकते हैं। इससे जातिगत रेखाओं के पार संबंधों की अधिक सामाजिक स्वीकृति और सामान्यीकरण का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। इन विवाहों को प्रोत्साहित करने के लिए व्यापक कार्यक्रम शुरू किए जाने चाहिए। इसमें वित्तीय लाभ, सामाजिक मान्यता और कानूनी सहायता प्रदान की जाए। विविध पृष्ठभूमि के व्यक्तियों को एकजुट होने के लिए प्रोत्साहित करके, जाति की कठोर सीमाएं धीरे-धीरे खत्म हो सकती हैं। इससे समावेशिता की संस्कृति को बढ़ावा मिलता है।
सामाजिक एकीकरण के लिए शैक्षिक सुधार भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। विशेष रूप से निचले तबके के छात्रों के लिए छात्रवृत्ति कार्यक्रम और शैक्षिक अवसर बनाना उन्हें सशक्त बना सकता है। इससे वे प्रतिस्पर्धा की दुनिया में सक्षम हो सकते हैं। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच सुनिश्चित करके, वंचित लोग अपनी सामाजिक स्थिति से ऊपर उठ सकते हैं। अपनी अनूठी प्रतिभा और दृष्टिकोण को मुख्यधारा में ला सकते हैं। यह सशक्तिकरण न केवल व्यक्तिगत विकास को बढ़ावा देता है बल्कि पूरे राष्ट्र को समृद्ध भी बनाता है।
इस प्रक्रिया में मीडिया और सामाजिक मंचों की भूमिका को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए। अंतर्जातीय विवाह और साझेदारी की सफलता की कहानियों का जश्न मनाने वाले अभियान धारणाओं को बदल सकते हैं, और अधिक प्रगतिशील सामाजिक मानसिकता का निर्माण कर सकते हैं।
इसके अलावा, अंतर्जातीय जोड़ों की सुरक्षा के लिए कानूनी ढांचे को मजबूत करने की आवश्यकता है। अपनी जाति से बाहर विवाह करने का विकल्प चुनने वाले व्यक्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सर्वोपरि है। ऐसे कानून बनाए जाने चाहिए जो ऐसे विवाहों से उत्पन्न होने वाले भेदभाव या हिंसा के मामलों में न्याय के लिए स्पष्ट रास्ते प्रदान करें। इससे जाति-आधारित हिंसा और पूर्वाग्रह के खिलाफ एक मजबूत संदेश जाएगा। सहिष्णुता और उदार आदर्शों में निहित बहुसंख्यक समुदाय का सशक्तिकरण महत्वपूर्ण है। जब हिंदू समावेशिता और स्वीकृति के झंडे तले एकजुट होते हैं, तो वे विभाजनकारी ताकतों के खिलाफ एक मजबूत मोर्चा पेश कर सकते हैं। आपसी सम्मान और साझा मानवता पर बनी नींव एक मजबूत, अधिक लचीले भारत की ओर ले जा सकती है।
विकसित भारत में जाति व्यवस्था की बाधाओं को कम करने के सामूहिक प्रयास के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है। अंतर्जातीय विवाह को बढ़ावा देना, शैक्षिक सुधारों को बढ़ाना और रचनात्मक संवाद को बढ़ावा देना एक समावेशी समाज के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।






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