यहां सवा मन घी से होता है गणपति का श्रृंगार...


इंदौर स्थित बड़े गणेश मंदिर की स्थापना साल 1901 में हुई थी। इसके बाद, धीरे-धीरे इंदौर का जिस तरह से विकास हुआ, उसके साथ इस मंदिर की ख्याति भी बढ़ी। जो भक्त भगवान खजराना गणेश के दर्शन करने के लिए इंदौर आते हैं, वे बड़े गणेश के भी दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं।

मूर्ति स्थापना के बाद से ही यहां पर हर साल गणेश उत्सव के दौरान अलग-अलग तरह के आयोजन होते हैं। स्थानीय लोगों में ऐसी मान्यता है कि यदि सवा मन सामग्री से भगवान गणेश का श्रृंगार किया जाता है तो भगवान गणेश सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।

इस मूर्ति के सबसे बड़े आकर्षण की बात यह है कि यह बहुत सारे पदार्थों से मिलकर बनी है। जैसे, इसमें ईंट, चूना पत्थर, बालू व मेथी का दाना तथा अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, अवंतिका, उज्जैन व द्वारका सहित सात जगहों की मिट्टी लगी हुई है।

साथ ही, गाय, घोडा व हाथी की लीद के साथ-साथ हीरा, पन्ना, रूबी, नीलम व मोती जैसे पंचरत्नों का इस्तेमाल किया गया है। प्रतिमा के निर्माण में सभी तीर्थ नदियों के जल का उपयोग किया गया था। मूर्ति चार फीट ऊंचे चबूतरे पर विराजित है।

इस प्रतिमा को बनाने के लिए अलग-अलग धातुओं का प्रयोग किया गया है। कान, हाथ और सूंड तांबे से बने हैं और पैरों के लिए लोहे की सरियों का इस्तेमाल किया गया है। मुख के लिए सोने और चांदी का उपयोग किया गया है। मूर्ति के एक हाथ में लड्डू तो दूसरे हाथ में शस्त्र व शास्त्र हैं। मूर्ति का रंग सिंदूरी है। प्रतिमा को सजाने में ही 15 दिन का समय लगता है।

सवा मन यानी करीब 14 किलोग्राम शुद्ध देशी घी और 25 किलोग्राम सिंदूर से गणपति का श्रृंगार होता है। 25 फीट ऊंची और 14 फीट चौड़ी मूर्ति को 11 ब्राह्मणों द्वारा चोला चढ़ाया जाता है। साल में चार बार भाद्रपद सुदी चतुर्थी, कार्तिक बदी चतुर्थी, माघ बदी चतुर्थी और बैशाख सुदी चतुर्थी पर चोला और सुंदर वस्त्रों से श्रृंगार किया जाता है।

माना जाता है कि एशिया में यह सबसे बड़ी गणेश प्रतिमा है। इस प्रतिमा को बनाने में करीब तीन साल का समय लगा था और इसका निर्माण कार्य 17 जनवरी 1901 को पूरा हुआ। 



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