हसीन वादियों में प्रेम की धुन सुनाता है गीत ‘इन हसीं वादियों से...’

हिंदी फिल्मों के कुछ गीत ऐसे हैं, जिन्हें सुनते हुए आंखों के सामने पहाड़ों की हरियाली, झरनों का संगीत और प्रेम में डूबे दो दिलों की तस्वीर उभरने लगती है। साल 1981 में रिलीज हुई फिल्म ‘प्यासा सावन’ का गीत ‘इन हसीं वादियों से दो चार नजारे...’ ऐसा ही एक गीत है। इसमें प्रकृति की सुंदरता को केवल देखने की वस्तु नहीं, बल्कि प्रेम के अनुभव का हिस्सा बनाया गया है। विशाल आकाश से कुछ सितारे चुरा लेने और खूबसूरत वादियों से कुछ नजारे अपने साथ ले जाने की कल्पना गीत को एक सहज रोमांटिक रंग देती है।

इस गीत को लता मंगेशकर और सुरेश वाडकर ने अपनी आवाज दी थी। संतोष आनंद के लिखे शब्दों को लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की संगीतकार जोड़ी ने धुन में ढाला। गीत के फिल्मांकन में जीतेन्द्र और रीना रॉय पर्दे पर नजर आए थे। फिल्म का निर्देशन दसारी नारायण राव ने किया था, जबकि प्रसाद कपूर इसके निर्माता थे।

इस गीत की खूबी इसके मुखड़े में छिपी है। ‘इन हसीं वादियों से दो चार नजारे चुरा लें तो चलें...’ जैसी पंक्ति प्रेम को एक खूबसूरत शरारत का रूप देती है। यहां प्रेमी प्रकृति पर अधिकार जताने नहीं निकले हैं, बल्कि उसकी सुंदरता में से कुछ यादें समेट लेना चाहते हैं।

गीत में झरने का गजल गाना और बुलबुल का तराना सुनाना प्रकृति को मानवीय संवेदना से जोड़ता है। पानी की कलकल, पक्षियों की आवाज और सांसों की लय मिलकर ऐसा वातावरण रचते हैं, जिसमें प्रेम का एहसास किसी संवाद का मोहताज नहीं रहता है। संतोष आनंद की शब्द-रचना में प्रकृति और जवानी का यह मेल गीत को केवल सुंदर दृश्यों का वर्णन बनने से बचाता है। इसमें दो लोगों के बीच पनपते रिश्ते की खुशी और एक नई शुरुआत का उत्साह भी शामिल है।


लता मंगेशकर की आवाज में कोमलता और सुरेश वाडकर की गायिकी में ताजगी इस युगल गीत को अलग पहचान देती है। दोनों आवाजें एक-दूसरे के साथ सहजता से आगे बढ़ती हैं। गीत की धुन में ऐसी मिठास है, जो इसे सुनने वाले को अपने साथ बहा ले जाती है। संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने शब्दों की रोमांटिक प्रकृति के अनुरूप धुन तैयार की, जिसमें गायिकी और संगीत एक-दूसरे पर हावी होने के बजाय भाव को आगे बढ़ाते हैं। सुरेश वाडकर के शुरुआती चर्चित फिल्मी गीतों में इसे गिना जाता है।

‘प्यासा सावन’ का संगीत अपने समय के हिंदी फिल्मी गीतों की उस परंपरा का हिस्सा है, जिसमें मधुर धुन, याद रह जाने वाला मुखड़ा और भावनाओं से जुड़े बोल मिलकर गीत को लोकप्रिय बनाते हैं। कई अन्य गानों के साथ, ‘इन हसीं वादियों से...’ की अपनी अलग पहचान है।

35 वर्ष से ज्यादा समय गुजर जाने के बाद, आज भी इस गीत को सुनते हुए लगता है कि प्रेम की सबसे सुंदर स्मृतियां अक्सर किसी बड़े वादे या भव्य आयोजन से नहीं, बल्कि साथ बिताए गए छोटे-छोटे पलों से बनती हैं। किसी खूबसूरत जगह पर ठहर जाना, हवा के साथ बहती धुन को महसूस करना या किसी प्रिय व्यक्ति के साथ आकाश की ओर देखना जीवनभर याद रह सकता है। ‘इन हसीं वादियों से...’ इसी अनुभूति को संगीत में पिरोता है।

फिल्म के इस गीत के साथ मेरी एक व्यक्तिगत याद भी जुड़ी हुई है, उसका उल्लेख फिर कभी...