कुछ गीत ऐसे होते हैं, जो प्रेम की कहानी को उसके सुखद पलों से नहीं, बल्कि बिछड़ने के बाद बची यादों से व्यक्त करते हैं। ऐसे गीतों में प्रेमी की मौजूदगी से अधिक उसकी अनुपस्थिति बोलती है। साल 1961 में रिलीज हुई फिल्म ‘हमारी याद आएगी’ का गीत ‘कभी तन्हाइयों में...’ इसी भाव का एक यादगार उदाहरण है।
मुबारक बेगम की दर्द में डूबी आवाज, स्नेहल भाटकर की भावपूर्ण धुन और केदार शर्मा के शब्द मिलकर ऐसा वातावरण रचते हैं, जिसमें प्रेम की स्मृति एक मीठी अनुभूति के बजाय कसक बनकर उभरती है।
गीत का मुखड़ा ही उसकी पूरी भावनात्मक दुनिया का संकेत दे देता है। गीत के बोलों में प्रेम की एक तीखी शिकायत छिपी है। गीत में विरह के साथ आत्मसम्मान और शिकायत का स्वर भी सुनाई देता है। प्रेम यहां केवल पाने का नाम नहीं है, बल्कि यह उस भावनात्मक असर का भी नाम है, जो किसी के चले जाने के बाद दूसरे व्यक्ति के जीवन में बना रहता है।
केदार शर्मा के लेखन और निर्देशन में बनी ‘हमारी याद आएगी’ एक रोमांटिक सामाजिक फिल्म थी। इसमें अशोक शर्मा, तनुजा, अनंत कुमार, माधवी आदि कलाकार दिखाई दिए। पर्दे पर तनुजा ने मुबारक बेगम की आवाज को दृश्यात्मक अभिव्यक्ति दी। तब तक वह एक बाल कलाकार के रूप में अपनी पहचान बना चुकी थीं; इस गीत ने उन्हें एक परिपक्व नायिका के रूप में दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया।
गीत के फिल्मांकन की विशेषता उसकी भावनात्मक प्रस्तुति है। इसका प्रभाव पात्र के चेहरे, उसकी भाव-भंगिमा और गीत के शब्दों से निर्मित अकेलेपन में है। तनुजा की पर्दे पर मौजूदगी गीत को केवल पार्श्व में बजती एक धुन नहीं रहने देती है, बल्कि उसे पात्र की मनःस्थिति से जोड़ती है। मुबारक बेगम की आवाज में जिस तरह ‘याद आएगी...’ का भाव उभरता है, दृश्य भी उसी स्मृति और पीड़ा के अनुभव को आगे बढ़ाता है। फिल्म का श्वेत-श्याम रूप इस भाव के अनुरूप एक अलग तरह की दृश्यात्मक सादगी प्रदान करता है।
शुरुआत में ‘कभी तन्हाइयों में...’ को एक पूरा गीत बनाने की योजना नहीं थी। इसकी कुछ पंक्तियों का इस्तेमाल फिल्म में पार्श्व संगीत के रूप में किया जाना था। रिकॉर्डिंग के बाद जब गीत के अलग-अलग हिस्सों को जोड़कर सुना गया, तो उसकी प्रभावशीलता ने निर्माताओं को इसे रिकॉर्ड के रूप में जारी करने के लिए प्रेरित किया। इस तरह जो रचना शुरू में फिल्म के एक प्रसंग के लिए तैयार की गई थी, वह आगे चलकर मुबारक बेगम की सबसे चर्चित प्रस्तुतियों में शामिल हो गई। इसे सुनते समय बहुत से लोग समझते थे कि इस गीत को लता मंगेशकर ने गाया है।
केदार शर्मा ने शब्दों के माध्यम से अंधेरे, बिजली और तन्हाई को भावनात्मक प्रतीकों में बदल दिया। बिजली की चमक क्षणिक होती है, लेकिन उसका प्रभाव अचानक और तीव्र होता है। इसी तरह किसी पुराने प्रेम की याद भी लंबे समय तक शांत पड़े मन को एकाएक विचलित कर सकती है। कभी कोई आवाज, कोई जगह या रात का कोई शांत क्षण बीते संबंध की याद दिला देता है, और व्यक्ति वर्तमान में रहते हुए भी कुछ पल के लिए अतीत में लौट जाता है। गीत अपनी धुन, शब्दों और गायकी के बल पर श्रोताओं की स्मृति में जगह बनाने में सफल हुआ।
इस गीत की लोकप्रियता ने मुबारक बेगम को व्यापक पहचान दिलाई, लेकिन उनका फिल्मी सफर बाद के वर्षों में अपेक्षित ऊंचाइयों तक नहीं पहुंच पाया। उन्होंने एसडी बर्मन, नौशाद, कल्याणजी-आनंदजी, जयदेव और अन्य संगीतकारों के लिए भी गीत गाए।
करीब छह दशक बीत जाने के बाद आज भी यह गीत सुनते समय ऐसा लगता है, जैसे कोई पुरानी स्मृति अचानक मन के बंद दरवाजे खोल रही हो। शायद इसी वजह से इसकी गूंज आज भी उन लोगों के दिलों तक पहुंचती है, जिन्होंने कभी किसी अपने को खोया है या किसी अधूरी कहानी को अपने भीतर संभाल रखा है।

Related Items
‘दिल में हो...’ के जरिए जब दिल में उतर गईं एक ही धुन पर प्रेम की दो आवाजें...
अतीत और वर्तमान के प्रेम की दो आवाजें हैं ‘इस तरह आशिकी का...’
हसीन वादियों में प्रेम की धुन सुनाता है गीत ‘इन हसीं वादियों से...’