विरह की वेदना को स्वर देता है ‘नैना ये बरसे...’

साल 1985 में रिलीज हुई फिल्म ‘मोहब्बत’ का लता मंगेशकर की आवाज में सजा गीत ‘नैना ये बरसे...’ प्रेम की उस स्थिति को व्यक्त करता है, जब दिल किसी के इंतजार में डूबा हो और परिस्थितियां चाहकर भी दो प्रेमियों को एक-दूसरे के करीब नहीं आने देती हैं।

‘खुद को भुला देंगे, तब तुझे भूलेंगे हम...’ जैसी पंक्ति प्रेम की गहराई को इस तरह व्यक्त करती है कि भूलने की कोशिश भी यादों को और मजबूत बनाती जाती है। गीतकार इंदीवर की लेखनी इस रचना को भावनात्मक गहराई देती है। उनके शब्द सहज हैं, लेकिन उनमें छिपे अर्थ बेहद प्रभावशाली हैं। आंखों का बरसना और मिलने के लिए तरसना, दोनों ही बिंब प्रेम-विरह की अनुभूति को सीधे श्रोता तक पहुंचाते हैं। गीत में कठिन शब्दों या भारी-भरकम काव्यात्मक अभिव्यक्ति नहीं है। बेहद सरल शब्द ही उस मनःस्थिति को सामने रख देते हैं, जिसमें प्रेम करने वाला व्यक्ति अपने प्रिय से दूर रहकर भी उससे अलग नहीं हो पाता है। यही सहजता इस गीत को बार-बार सुनने पर भी आत्मीय बनाए रखती है।

 

संगीतकार बप्पी लाहिरी ने इस गीत को ऐसी धुन दी, जिसमें प्रेम की कोमलता और विरह की कसक एक साथ महसूस होती हैं। अस्सी के दशक में बप्पी लाहिरी को डिस्को संगीत और तेज लय वाले गीतों के लिए खास पहचान मिली थी, लेकिन उनकी संगीत प्रतिभा का दूसरा पक्ष भी उतना ही उल्लेखनीय था। ‘नैना ये बरसे...’ इस बात की याद दिलाता है कि वह केवल थिरकने पर मजबूर करने वाली धुनों के संगीतकार नहीं थे, बल्कि भावनात्मक गीतों को भी अपनी अलग पहचान दे सकते थे।

लता मंगेशकर की गायकी इस गीत का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है। उनकी आवाज में प्रेम की शिकायत है। लेकिन, प्रिय के प्रति कटुता नहीं बल्कि जुदाई का दर्द है। वह विरह को किसी बनावटी नाटकीयता के बिना व्यक्त करती है। आवाज की कोमलता और शब्दों के भाव के बीच ऐसा संतुलन बनता है कि गीत सुनते हुए श्रोता सहज ही उसकी नायिका की मनःस्थिति से जुड़ जाता है। लता की गायकी की यही विशेषता थी कि वह किसी पंक्ति को केवल गाती नहीं थीं, बल्कि उसके भीतर छिपी भावना को भी स्वर देती थीं।

फिल्म ‘मोहब्बत’ में अनिल कपूर ने शेखर और विजेयता पंडित ने रूपा की भूमिकाएं निभाई थीं। दोनों का प्रेम इस फिल्म की कहानी का केंद्रीय भाव है, लेकिन सामाजिक परिस्थितियां उनके मिलन के रास्ते में बाधा बनती हैं। शेखर और रूपा विवाह करना चाहते हैं, मगर दहेज की मांग के कारण उनके रिश्ते पर संकट आ जाता है। रूपा के पिता आर्थिक सीमाओं के कारण इस मांग को पूरा नहीं कर पाते हैं और उसके विवाह के लिए दूसरा रास्ता तलाशने लगते हैं। प्रेम और पारिवारिक दबाव के बीच फंसे इन किरदारों की कहानी में विरह का भाव स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है।

किशोर कुमार की आवाज में गाया गया गीत ‘सांसों से नहीं...’ फिल्म में मध्यांतर के पहले आता है। इसी गाने को फिल्म के दूसरे हाफ में 'नैना ये बरसे...' पूर्णता देता है। ‘सांसों से नहीं...’ मिलन का गीत है तो 'नैना ये बरसे...' विरह की वेदना दर्शाता है। इस तरह फिल्म में प्यार के दोनों भावों का एक चक्र पूरा होता है।

फिल्म ‘मोहब्बत’ तमिल फिल्म ‘थूरल निन्नू पोचू’ की हिंदी रीमेक थी। मूल तमिल फिल्म के लेखक और निर्देशक के भाग्यराज थे, जबकि हिंदी संस्करण का निर्देशन बापू ने किया था। निर्माण 'दिल', 'बेटा' और 'राजा' वाले इंद्र कुमार और अशोक ठकेरिया ने किया था।

फिल्में बदलती हैं, प्रेम व्यक्त करने के तरीके बदलते हैं और संगीत सुनने के माध्यम भी बदल जाते हैं, लेकिन किसी अपने से मिलने की तड़प का अनुभव आज भी उतना ही मानवीय है। शायद यही वजह है कि ‘नैना ये बरसे...’ जैसे गीत केवल अपने दौर की याद बनकर नहीं रह जाते हैं बल्कि वे उन भावनाओं को आवाज देते रहते हैं, जिन्हें इंसान अपने भीतर महसूस तो करता है, लेकिन शब्दों में कह नहीं पाता है। लता मंगेशकर की आवाज में यह गीत प्रेम, प्रतीक्षा और विरह की ऐसी स्मृति बन जाता है, जो सुनने वाले के मन में देर तक गूंजती रहती है।