भारत में अनेक मंदिर अपनी अद्भुत विशेषताओं और पौराणिक कथाओं के कारण श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। इनमें से एक है गुजरात के भावनगर जिले के पास कोलियाक तट पर स्थित निष्कलंक महादेव मंदिर। यह मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि अपनी अनोखी भौगोलिक स्थिति और समुद्र से जुड़ी अद्भुत घटनाओं के कारण भी विशेष स्थान रखता है।
अरब सागर के बीच लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर स्थित इस मंदिर में पांच स्वयंभू शिवलिंग स्थापित हैं। प्रत्येक शिवलिंग के सामने नंदी की मूर्ति विराजमान है। मंदिर की सबसे अनोखी विशेषता यह है कि प्रतिदिन दोपहर एक बजे से रात दस बजे तक समुद्र का जल पीछे हट जाता है और भक्त नंगे पांव चलकर मंदिर तक पहुंच सकते हैं। इसके बाद ज्वार बढ़ने पर मंदिर पूरी तरह जलमग्न हो जाता है और केवल ध्वज और स्तंभ दिखाई देते हैं। यह दृश्य श्रद्धालुओं को आस्था और आश्चर्य दोनों का अनुभव कराता है।
मंदिर की वास्तुकला भी अद्वितीय है। इसे इस प्रकार बनाया गया है कि समुद्र की तेज लहरें और ज्वार‑भाटा भी इसकी संरचना को नुकसान नहीं पहुंचा पाते हैं। मंदिर के चारों ओर बना चबूतरा इसे सहारा देता है। शीर्ष पर स्थापित ध्वज पूरे वर्ष लहराता रहता है और समुद्र की लहरों, तेज हवाओं तथा प्राकृतिक आपदाओं के बावजूद अप्रभावित रहता है। यहां तक कि 2001 के विनाशकारी भूकंप को भी इस ध्वज ने बिना किसी क्षति के सहन किया।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद पांडव अपने पापों के प्रायश्चित हेतु भगवान श्रीकृष्ण की शरण में गए। कृष्ण ने उन्हें एक काला ध्वज और एक काली गाय दी और कहा कि जब दोनों श्वेत हो जाएंगे, तब उनके पाप क्षमा होंगे। पांडवों ने वर्षों तक विभिन्न स्थानों पर गाय का पीछा किया, लेकिन ध्वज और गाय का रंग नहीं बदला। अंततः जब वे कोलियाक तट पर पहुँचे, तो दोनों श्वेत हो गए। यहां पांडवों ने भगवान शिव की आराधना की और पांचों भाइयों को शिवलिंग रूप में दर्शन प्राप्त हुए। इन्हीं को अमावस्या की रात चौकोर मंच पर स्थापित कर मंदिर का नाम निष्कलंक महादेव रखा गया, जिसका अर्थ है निर्दोष और पवित्र।
मंदिर से जुड़ी धार्मिक परंपराएं आज भी जीवित हैं। श्रावण माह के सोमवार को हजारों श्रद्धालु यहां एकत्रित होते हैं। भाद्रपद अमावस्या पर यहां विशाल लोक मेले का आयोजन होता है, जिसे स्थानीय लोग ‘नकलांग मेला’ कहते हैं। अनुमान है कि इस मेले में 2‑3 लाख लोग शामिल होते हैं। भावनगर राज्य के महाराजा द्वारा मंदिर को 52 गज का पूजनीय ध्वज भेंट करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। वैदिक मंत्रों के उच्चारण के साथ ध्वज फहराने के साथ ही मेले का शुभारंभ होता है। यह ध्वज पूरे वर्ष मंदिर के शीर्ष पर लहराता रहता है और अगले वर्ष नए ध्वज से प्रतिस्थापित किया जाता है।
मंदिर पहुंचने पर भक्त सबसे पहले ‘पांडव तालाब’ में स्नान करते हैं और फिर शिवलिंगों की पूजा करते हैं। मान्यता है कि यहां दर्शन करने से पाप धुल जाते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। श्रद्धालु मानते हैं कि यदि किसी प्रियजन की चिता की राख शिवलिंग पर लगाकर जल में प्रवाहित कर दी जाए तो उसे मोक्ष प्राप्त होता है। अमावस्या और पूर्णिमा के दिनों में ज्वार विशेष रूप से सक्रिय होते हैं और भक्त समुद्र के शांत होने का बेसब्री से इंतजार करते हैं ताकि मंदिर तक पहुंच सकें।
निष्कलंक महादेव मंदिर भावनगर से लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित है। यहां तक पहुंचने के लिए टैक्सी या बस का उपयोग किया जा सकता है। मंदिर के अलावा कोलियाक तट पर अन्य दर्शनीय स्थल भी हैं, जिनमें कोलियाक बीच, मांडवी बीच और पिरम बेट शामिल हैं। ये स्थल प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक महत्व के कारण पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।
निष्कलंक महादेव मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह आस्था, परंपरा और प्रकृति के अद्भुत संगम का प्रतीक है। समुद्र के बीच स्थित यह मंदिर भक्तों को यह संदेश देता है कि सच्ची श्रद्धा और प्रायश्चित से पाप धुल सकते हैं और जीवन शुद्ध हो सकता है। सदियों पुरानी परंपराएं, पौराणिक कथाएं और प्राकृतिक चमत्कार इस मंदिर को भारत के अद्वितीय धार्मिक स्थलों में शामिल करते हैं।

पवन गौतम





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