शेखावाटी के मारवाड़ियों ने ऐसे खड़े किए भारत के कारोबारी साम्राज्य...

कैमरा घूमता है। पर्दे पर एक भव्य हवेली दिखाई देती है। मोटे-से सेठजी अपनी गद्दी पर बैठे हैं। आसपास बही-खाते, तिजोरियां और रुपयों के बक्से रखे हैं। पास में पुराने हिन्दी सिनेमा के परिचित मुनीमजी खड़े हैं, एक्टर कन्हैया लाल, चेहरे पर चालाक मुस्कान और हाथ में मोटा हिसाब-किताब।

कोई मदद मांगता है, तो पहले खर्च का हिसाब होता है। कोई कर्ज मांगता है, तो ब्याज की नई दर खुल जाती है। दशकों तक हिन्दी फिल्मों ने मारवाड़ी व्यापारी की एक ऐसी छवि बनाई; चतुर, कंजूस और हर समय मुनाफे के पीछे भागने वाला। लेकिन, पूरी सच्चाई इतनी भर नहीं थी।

Read in English: How Shekhawati’s Marwaris helped build India’s business empires…

यह छवि दर्शकों का मनोरंजन जरूर करती रही, मगर एक जीवंत और कर्मठ समुदाय को मजाकिया या खलनायक जैसे किरदारों तक सीमित कर दिया गया। मारवाड़ियों ने केवल दौलत नहीं कमाई। उन्होंने कारखाने लगाए, रोजगार पैदा किए, स्कूल और अस्पताल बनाए और आधुनिक भारत के उद्योगों की बुनियाद मजबूत की।

इस कहानी की शुरुआत राजस्थान के शेखावाटी इलाके से होती है; चूरू, सीकर और झुंझुनूं का सूखा और कठिन भूभाग। यहां पानी कम था, खेती अनिश्चित थी और गर्मियों में धरती अंगारों जैसी तपती थी। इस इलाके ने लोगों को वह सब सिखाया, जो उपजाऊ मैदान शायद ही सिखा पाते हैं; मुश्किल हालात में जीना और कमी को अवसर में बदलना।

इन्हीं धूलभरे कस्बों से भारत के कई बड़े कारोबारी घराने निकले, बिड़ला, बजाज, डालमिया, गोयनका, सिंघानिया, पोद्दार, रूइया, पीरामल और अनेक अन्य। पीढ़ी-दर-पीढ़ी इन परिवारों ने देश के उद्योग, व्यापार और वित्तीय दुनिया की तस्वीर बदली।

मगर शेखावाटी का योगदान केवल कारोबार तक सीमित नहीं रहा। झुंझुनूं को ‘शहीदों की नगरी’ भी कहा जाता है। यहां के गांवों से पीढ़ियों से नौजवान सेना में जाते रहे हैं। एक तरफ सीमा पर देश की रक्षा करने वाला जवान था, दूसरी तरफ देश की आर्थिक ताकत बढ़ाने वाला उद्यमी। दोनों को हिम्मत, अनुशासन और सब्र की जरूरत थी।

नक्शे को गौर से देखिए, तो व्यापार का इतिहास एकदम निजी और जीवंत लगने लगता है। पिलानी का नाम बिड़ला परिवार से जुड़ा है। उन्नीसवीं सदी में शिव नारायण बिड़ला बंबई गए और उनके वंशजों ने भारत के सबसे बड़े औद्योगिक घरानों में से एक खड़ा किया। चिड़ावा डालमियाओं से जुड़ा रहा। नवलगढ़ ने गोयनका, पोद्दार, केड़िया, सेक्सारिया और मोरारका जैसे कारोबारी परिवारों को जन्म दिया। रामगढ़ का रिश्ता रूइया और पोद्दार परिवारों से है, जबकि बगर पीरामल परिवार से जुड़ा है।

सीकर के पास काशी का बास में जमनालाल बजाज का जन्म हुआ। आगे चलकर वह बड़े उद्योगपति ही नहीं, बल्कि आजादी की लड़ाई के प्रमुख समर्थक भी बने। चूरू के सादुलपुर ने लक्ष्मी मित्तल को जन्म दिया, जिन्होंने दुनियाभर में इस्पात का विशाल साम्राज्य खड़ा किया। सिंघानिया, सर्राफ, मोदी और अनेक परिवारों ने भी अपने-अपने ढंग से ऐसी ही राह तय की।

दिलचस्प बात यह है कि इनमें से अधिकतर दौलत शेखावाटी में नहीं बनी। रेगिस्तान ने उन्हें जड़ें दीं, जबकि कोलकाता, बंबई और दूसरे व्यापारिक शहरों ने उन्हें बड़ा मंच दिया। मारवाड़ियों की सफलता केवल मितव्ययिता या बचत का नतीजा नहीं थी। इसके पीछे भरोसा, अनुशासन और बदलते समय के साथ ढलने की क्षमता थी। आर्थिक इतिहासकार थॉमस ए टिम्बर्ग ने इस सफलता के कई महत्वपूर्ण कारण बताए हैं।

सबसे पहले था समुदाय का मजबूत नेटवर्क। शेखावाटी से निकलने वाला कोई युवा आर्थिक मायने में कभी अकेला नहीं होता था। रिश्तेदार उसे व्यापारियों से मिलवाते, रहने की जगह देते, उधार दिलाते और कारोबार की तालीम का इंतजाम करते। एक व्यापारी की सफलता दूसरे के लिए रास्ता खोलती। गांव और परिवार के रिश्ते धीरे-धीरे देशव्यापी कारोबारी नेटवर्क बन गए।

दूसरी बड़ी चीज थी साख। नकद पैसा जरूरी था, लेकिन आदमी का वचन अक्सर उससे भी ज्यादा कीमती माना जाता था। व्यापारी पैसा खोकर फिर संभल सकता था, लेकिन साख खोने पर कारोबार के दरवाजे बंद हो सकते थे।

टिम्बर्ग ने मारवाड़ी व्यापारियों के कड़े वित्तीय अनुशासन पर भी जोर दिया। पारंपरिक बही-खाता केवल हिसाब लिखने की किताब नहीं था। वह रोजाना मुनाफे, नुकसान और जिम्मेदारियों पर नजर रखने की पूरी संस्कृति थी। साथ ही, जरूरत पड़ने पर सोच-समझकर जोखिम उठाने का साहस भी था, खासकर वस्तुओं के व्यापार और सट्टे में।

सबसे बड़ी खूबी थी उनकी अनुकूलन क्षमता। मुगल दौर में मारवाड़ी वित्तदाता और साहूकार बने। अंग्रेजों के समय वे दलाल, ब्रोकर और व्यापारिक मध्यस्थ बने। बाद में उन्होंने तेजी से उद्योगों की तरफ कदम बढ़ाया। संयुक्त परिवार और आपसी भरोसे की पुरानी व्यवस्था आधुनिकता के रास्ते में रुकावट नहीं बनी। उलटे, इनसे पूंजी जुटाने, जोखिम बांटने और लंबे कारोबारी रिश्ते निभाने में मदद मिली।

भूगोल ने भी इस सफलता में अपना हिस्सा निभाया। अठारहवीं सदी में स्थानीय शासकों ने रास्ते के कर कम किए और व्यापार को बढ़ावा दिया। कपास, ऊन और मसालों से भरे काफिले इस इलाके से गुजरते थे। उन्नीसवीं सदी में रेलवे के आने से व्यापार की दुनिया बदल गई। कोलकाता और बंबई नए आकर्षण के केंद्र बन गए।

शेखावाटी के व्यापारी वहां पहुंचे। पहले व्यापारी और वित्तदाता के रूप में, फिर मिलों, कारखानों और बड़े औद्योगिक घरानों के मालिक के रूप में। बीसवीं सदी तक वे कपड़ा, जूट, इस्पात, सीमेंट, मोटर उद्योग और वित्त की दुनिया के बड़े खिलाड़ी बन चुके थे।

रेगिस्तान ने उन्हें चलना सिखाया, बाजार ने उन्हें विस्तार करना सिखाया। कमी एक सख्त उस्ताद थी। अनिश्चित बारिश, कीमती पानी और स्थानीय अवसरों की कमी ने लोगों को बाहर निकलने के लिए मजबूर किया। सेना की परंपरा को मजबूत करने वाला अनुशासन और धैर्य ही कारोबारियों के भी काम आए।

धर्म और सामुदायिक संस्थाओं ने भी सामाजिक रिश्तों को मजबूत रखा। रानी सती, खाटू श्यामजी और सालासर बालाजी जैसे तीर्थ आज भी आस्था के बड़े केंद्र हैं। मंडावा, नवलगढ़, फतेहपुर और रामगढ़ की रंगीन हवेलियां एक और कहानी कहती हैं। ये उन परिवारों की निशानियां हैं, जिन्होंने दूर-दराज के शहरों में दौलत कमाई, लेकिन अपने रेगिस्तान को सजाने के लिए लौट आए।

शेखावाटी की कहानी को केवल जाति या व्यापार की कहानी नहीं कहा जा सकता। राजपूत समुदायों ने मजबूत सैन्य और जमींदारी परंपराएं विकसित कीं। अग्रवाल, माहेश्वरी, ओसवाल और दूसरे व्यापारी समुदायों ने शक्तिशाली कारोबारी नेटवर्क बनाए।

दोनों ने देश को अलग-अलग तरह की ताकत दी; एक ने सरहदों की हिफाजत की, दूसरे ने देश की आर्थिक मांसपेशियां मजबूत कीं।

एक पुरानी कहावत इस जज्बे को खूब बयान करती है; जहां बैलगाड़ी पहुंच सकती है, वहां आखिरकार मारवाड़ी भी पहुंच जाएगा।

कुदरत ने इस इलाके को बहुत कम दिया था। मगर इसके लोगों ने भरोसे, साख, अनुशासन, गतिशीलता और लगातार मेहनत से मौके पैदा किए।

रेगिस्तान ने न तो जादू से अरबपति पैदा किए, न सैनिक। उसने बस ऐसे हालात पैदा किए, जिनमें संघर्ष करने की क्षमता आदत बनी; और वही आदत, वक्त के साथ, इतिहास बन गई।



Related Items

  1. सुदृढ़ भारत के लिए किसान अपना रहे हैं पुनर्योजी कृषि

  1. भारत में परंपरा से बहुत आगे निकल चुकी है नारियल की खेती

  1. तिब्बती लौट पाएंगे अपने वतन या भारत ही बनेगा उनका स्थायी घर!