सावन के सघन-घन की तरह जीवन-मय-सजल थे शिव प्रसाद गुप्त


प्यारे बापू ने उन्हें ‘राष्ट्ररत्न’ कहा तो यह उनकी 'पदवी' ही हो गई। महामना मालवीय के प्रति उनकी अपार श्रद्धा थी। मालवीय को वह ‘पिता’ कहते थे। बाबू शिव प्रसाद गुप्त सचमुच विरले ही व्यक्तित्व थे। रईसी कितना उदात्त, सरोकार संपन्न और परोपकारी हो सकती है, यह उनके संपूर्ण व्यक्तित्व और अवदान में देखा जा सकता है।

गुणग्राही गुप्त आधुनिक युग के महान दानवीर थे। समाज, संस्कृति, शिक्षा, स्वतंत्रता के लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया। मनसा-वाचा-कर्मणा और तन-मन-धन से समाज और राष्ट्र की सेवा ही उनका जीवन था। समाजसेवी, स्वतंत्रता सेनानी, स्वप्नदर्शी संस्थान निर्माता, परोपकारी - वह गुणों की खान थे।

अप्रतिम कृति उनकी आत्मकथा ‘अपनी ख़बर’ में अपने समय के धाकड़ साहित्यकार-लेखक बेचन शर्मा ‘उग्र’ ने उनके बारे में लिखा कि "अगर मुझे मज़े में विदित न होता कि दोष देवताओं में भी होता है, तो दिवंगत बाबू साहब को मैं आदमी न कह देवता ही कहता।" ‘उग्र’ लिखते हैं कि सावन के सघन-घन की तरह शिव प्रसाद सहज स्वभाव से सभी के लिए जीवन-मय-सजल थे।

विद्यार्थियों, विद्यालयों, समाज-सेवकों, राष्ट्र-कर्मियों, नेताओं, मालवीय और गांधी को मुक्तहस्त दान दिया करते थे, वह भी भावपूर्ण भक्ति से। बाबू शिवप्रसाद ने ही पूज्य महामना को काशी में हिन्दू विश्वविद्यालय के लिए प्रवृत्त किया। उस समय में एक लाख एक हजार रुपये का पहला दान उन्होंने ही दिया।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान अनेक विद्वानों, स्वतंत्रता सेनानियों से उनकी निकटता हुई। आचार्य नरेंद्र देव और पंडित गोविन्द वल्लभ पंत का उन्हें संग-सानिध्य मिला। बाबू शिव प्रसाद से मिलने वाला उस समय का हर शख्स उनके व्यक्तित्व-विचार और शील से प्रभावित हो जाता था।

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की प्रेरणा से वह कांग्रेस में शामिल होकर स्वतंत्रता संघर्ष को समर्पित हुए। महात्मा गांधी से पहली बार उनकी भेंट लंदन में हुई थी। अपनी विदेश यात्राओं में वह देश की स्वतंत्रता, बौद्धिकता और समाज तथा राष्ट्र के सर्वांगीण उत्थान के सूत्र तलाशते थे। जापान सहित यूरोप के देशों और अमेरिका आदि जाकर वह वहां के विद्वानों और प्रमुख लोगों से मिलते रहे। स्वदेश आकर उन्होंने अपने अनुभवों, अध्ययनों का समाज की चेतना जागृत करने में उपयोग किया।

असहयोग आंदोलन के दौरान ‘आज’ की स्थापना भी उन्होंने स्वतंत्रता अंदोलन की चेतना के लिए ही की। उन्होंने हिंदी के अनेक शब्दों की सर्जना की। उनके ज्ञानमंडल से भाषा, समाज, इतिहास, राजनीति और दर्शन आदि अनेक अनुशासनों की महत्वपूर्ण पुस्तकें छपीं।

ज्ञानमंडल, काशी विद्यापीठ, भारत माता मंदिर, अस्पताल (अभी जो उनके नाम पर जिला सरकारी अस्पताल है) आदि की स्थापना यह सिद्ध करता है कि वह कितने महान स्वप्नदर्शी थे...! भारत माता मंदिर की परिकल्पना उनके जैसा स्वप्नदर्शी ही कर सकता था! अप्रतिम भारत माता मंदिर का उद्घाटन बापू के करकमलों से साल 1936 में हुआ।

दलित, वंचित्त, निर्बल के लिए भी उन्होंने बहुत काम किया। छुआछूत हो या विधवाओं का उद्धार उनके योगदान अनन्य हैं। उन्होंने हर प्रकार से दुखी, वंचित्त, निर्बल को सहारा दिया। लोगों को प्रेरणा-प्रकाश दिया।

स्वतंत्रता आंदोलन की अग्रणी और प्रतिनिधि पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वह कोषाध्यक्ष भी रहे। साल 1928 में उन्होंने बनारस कांग्रेस की बैठक का सारा खर्च वहन किया। देश-प्रेम की प्रतिमूर्ति गुप्त आजादी, शिक्षा, भाषा उत्थान और जन जागरण के लिए मन-वचन-कर्म से सर्वस्व अर्पित करने वाले भारत माता के यशस्वी पुत्र थे।

उनका विशाल मनोरम आवास 'सेवा-उपवन' सचमुच सेवा-सत्कार और सहृदयता का ही उपवन रहा। सेवा-उपवन अपने आप में उदारता, सहृदयता, आतिथ्य की एक किताब या उल्लेखनीय दस्तावेज़ की तरह है। ‘अपनी खबर’ के अनुसार "काशी में आकर कोई भी बड़ा आदमी 'सेवा उपवन' में आकर ही सुविधा, आतिथ्य और सुख पाता था।"

उग्र लिखते हैं कि काशी में जो भी राष्ट्रीय चेतना जाग्रत हुई उसकी प्रेरणा में गांधी के बाद बाबू शिव प्रसाद गुप्त का नाम लेना ही समुचित लगता है।

शिव प्रसाद के प्रसाद का पुण्य-प्रकाश सारे उत्तर प्रदेश में और खुशबू सारे देश में थी। देश की आजादी, प्रगति, समाज-निर्माण के लिए उनकी अहर्निश भागीदारी, सिद्ध-संकल्प के कारण ब्रिटिश सत्ता ने उन्हें जेल भेज दिया।

‘उग्र’ के अनुसार "शिव प्रसाद जैसे रईस को जेल देना फांसी देने के बराबर था। वह जेल में ही बीमार पड़ गए। छूटे, तो उन्हें फ़ालिज मार गया। फ़ालिज मार गया? ऐसे नेक-दिल आदमी को जिसकी तुलना मैं देवता से करने को भी तैयार नहीं?"

निश्चित रूप से मौजूदा दौर में गुणों की खान महान व्यक्तित्व बाबू शिव प्रसाद गुप्त के योगदानों को एक बार फिर से बांचने और सहेजने की जरूरत है।



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