जरूरी नहीं कि भावों को व्यक्त करने के लिए हमेशा शब्दों का ही इस्तेमाल किया जाए लेकिन जब बात तीव्र और सशक्त अभिव्यक्ति की हो तो शब्द अनिवार्य बन जाते हैं। शब्द, भावों की शक्ति और जज्बातों की जुबां है। ऐसी जुबां जो कभी-कभी मात्र अभिव्यक्ति का साधन न रहकर ललकार में बदल जाती है जिसकी हुंकार भर से क्रोध, आक्रोश, असंतोष, घृणा, निराशा से व्याप्त भावनाओं का सैलाब कुछ यूं उमड़ता है कि सत्ता की नींव तक हिल जाती है।






Related Items
सिर्फ इमारतें ही नहीं, साहित्य और स्वतंत्रता संग्राम का भी गढ़ रहा है आगरा
साहित्यकार ही नहीं, स्वतंत्रता सेनानी भी थे फणीश्वर नाथ 'रेणु'
तस्वीरों में देखें 70वां स्वतंत्रता दिवस का जश्न