बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और पिछले ढाई दशक से मीडियाभारती के लिए लगातार लेखन कार्य कर रहे हैं।

पेरिस ने हमारा स्वागत नहीं किया बल्कि उसने पहले हमारा इम्तिहान लिया। यहां उतरते ही लगा कि हम किसी दूसरे ग्रह पर आ गए हैं। भाषा फ्रेंच थी, इमारतें बेहद सलीकेदार थीं, लोग फैशनेबल दिख रहे थे और ट्रैफिक ऐसा था जैसे सड़क पर कोई मुकाबला चल रहा हो। मौसम ने भी अपना अलग ही मिज़ाज दिखाया। कुल मिलाकर शहर नहीं बदला था, पूरी दुनिया बदल गई थी। और, फिर आया यूरोस्टार...

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“बस पांच मिनट और!”  ये वही फेमस पांच मिनट हैं जो घर के टाइमर नहीं मानते हैं। पेरिस के एक घर में 14 साल का बेटा मोबाइल से चिपका बैठा है; मां चिल्लाती है, “खाना ठंडा हो रहा है,” पिता आधे गुस्से में आधा विनती करते हैं, “मोबाइल नीचे कर दे।” बेटा पलटकर कहता है, “पापा, यह आखिरी वीडियो है।” लेकिन, वह वीडियो आखिरी नहीं होता। खुद-ब-खुद चलने वाले अगले-नेक्स्ट ने पांच मिनट को पचास में बदल दिया, और खाना ठंडा हो गया...

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क्या लंदन सिर्फ बिग बेन, बकिंघम पैलेस और टेम्स का नाम है? चंद रोज़ वहां बिताने के बाद लगा कि लंदन की असली कहानी पत्थरों की इमारतों में नहीं, उन लोगों में छिपी है जो इन इमारतों के बीच अपनी जिंदगी जी रहे हैं...

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क्या जिंदगी के हर सवाल का जवाब किसी मोटी-मोटी ज्ञान की किताब में ही छिपा है? या फिर कभी-कभी जवाब वहीं मिल जाता है, जहां हम देखना भूल जाते हैं; श्रीकृष्ण की सीख में...

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दो दिन पहले, 9/11 की बरसी थी। अमेरिका में शोक और स्मृति के कार्यक्रम आयोजित किए गए। ब्रिटेन में भी कई आयोजन हुए। दुनिया उस भयावह दिन को अब भी नहीं भूली है, जब कुछ विमानों ने केवल इमारतों को नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के आत्मविश्वास को हिला दिया था। आतंकवाद खत्म करने के लिए आखिर दुनिया को और कितने 9/11 चाहिए?

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आखिर एक इमारत सदियों तक कैसे टिकती है? अच्छी सामग्री? समझदार इंजीनियरिंग? नियमित रखरखाव? या प्रकृति का सम्मान? लगता है, इन सबकी जरूरत होती है। बस शायद नगर निगम के प्रमाणपत्र की नहीं...

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