धर्मेंद्र कुमार

दैनिक जागरण, अमर उजाला, नवभारतटाइम्स.कॉम और एनडीटीवीखबर.कॉम के रास्ते पत्रकारिता में पिछले दो दशक से ज्यादा समय से सक्रिय धर्मेंद्र कुमार मीडियाभारती वेब सॉल्युशन्स के प्रमुख हैं।

बिहार चुनावों के परिणाम हमारे सामने आ चुके हैं... और, जैसे कि पिछले कई बार से एक्जिट पोल के नतीजे लगातार गलत आ रहे हैं, इस बार भी गलत ही साबित हुए। तो, क्या अब वक्त नहीं आ गया है कि एक्जिट पोल की इस ‘बेवकूफाना’ अवधारणा को उठाकर डिब्बे में बंद कर कहीं दूर फेंक दिया जाए…? एक्जिट पोल की प्रासंगिकता और इससे जुड़े कई दूसरे सवालों पर बात करने के लिए आज हमारे साथ हैं मीडिया आलोचक और वरिष्ठ पत्रकार ब्रज खंडेलवाल। आप भी इस साक्षात्कार में हिस्सा ले सकते हैं। पूरा आलेख पढ़ने और साक्षात्कार में पूछे गए सवालों पर अपनी राय व्यक्त करने के लिए महज एक रुपये में अभी सब्सक्राइब करें...

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बिहार चुनावों के परिणाम आ चुके हैं। अब राज्य में राजनीतिक माहौल कैसा रहेगा और उसका एनडीए की राजनीति पर क्या असर पड़ने वाला है? इन सब सवालों पर बातचीत करने के लिए आज हमारे साथ हैं बिहार की जमीन से जुड़े पत्रकार बिपिन तिवारी। आप भी साक्षात्कार में पूछे गए सवालों के जवाब दे सकते हैं। पूरा आलेख पढ़ने और साक्षात्कार में हिस्सा लेने के लिए अभी सब्सक्राइब करें महज एक रुपये में...

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पूरी दुनिया में उत्तर और दक्षिण के बीच श्रेष्ठता को लेकर द्वंद्व की बात की जाती है। मानवीय रंग से जुड़ी संवेदनाएं भी इस संघर्ष में अपनी भूमिकाएं निभाती रही हैं। आदिकाल से चली आ रही यह बहस भारतीय उपमहाद्वीपीय समाज में भी नजर आती है। इस सामाजिक विवाद के स्वरूप और जटिलताओं को समझने के लिए, आज हमारे साथ हैं ह्यूमर टाइम्स की संपादक मुक्ता गुप्ता। पूरा आलेख पढ़ने और साक्षात्कार में शामिल सवालों पर अपनी राय व्यक्त करने के लिए अभी मात्र एक रुपये में सब्सक्राइब करें...

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... एक रात को दो बजे, जब अचानक नींद खुल गई तो टीवी से 'उलझ' बैठे और चैनल सर्फ करते-करते 'भोजपुरी टेरीटरी' तक जा पहुंचे। किसी मूवी चैनल पर निरहुआ की फिल्म 'बिदेसिया' आ रही थी। भोजपुरी में ऐसी फिल्में भी बनती हैं, जानकर अचंभा हुआ। नौटंकी विधा को फिल्म विधा के साथ गूंथकर बनाई गई यह फिल्म जब देखना शुरू किया तो फिर चैनल बदल ही नहीं पाए। जरूरी नहीं है कि मिठास और श्रम की भाषा भोजपुरी में 'बकवास' फिल्में ही बनती हैं, यहां 'बढ़िया' सिनेमा भी है। भोजपुरी सिनेमा के पुराने रसूख और मौजूदा स्थिति पर ढेर सारी बातें करने के लिए आज हमारे साथ मौजूद हैं, भोजपुरी संवेदनाओं से खास लगाव रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार और साहित्य समालोचक प्रमोद कुमार पांडेय...। पूरा आलेख पढ़ने व साक्षात्कार में सतत हिस्सा लेने के लिए अभी सब्सक्राइब करें...

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समाज में संवेदनहीनता लगातार बढ़ती जा रही है। अस्पतालों में, पुलिस के थानों में, किसी सरकारी दफ्तर में या कहीं भी आप जाएं और संवेदनहीनता से दो-चार न हों, यह आज की भागमभाग भरी जिंदगी में संभव ही नहीं है। संवेदनहीनता के कई ऐसे ही पहलुओं पर बात करने के लिए आज हमारे साथ हैं वरिष्ठ पत्रकार केशव चतुर्वेदी। आप भी इस बातचीत में भाग ले सकते हैं। इस विषय पर अपनी राय रखने और पूरा साक्षात्कार देखने के लिए अभी सब्सक्राइब करें...

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बिहार में चुनावी सरगर्मियां बहुत तेज हो गई हैं। दल-बदल और राजनीतिक दलों में तोड़म-फोड़ अपने चरम पर है। रोज नए सियासी समीकरण बन रहे हैं। नए-नए प्रयोग भी हो रहे हैं। चिराग पासवान एनडीए में हैं, लेकिन नहीं हैं। वह नीतीश कुमार के साथ भी नहीं हैं। एनडीए उनके दल ‘लोक जनशक्ति पार्टी’ को अपना घटक तो मानता है, लेकिन चुनावी अभियान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फोटो और नाम का इस्तेमाल करने से रोक भी रहा है। बिहार में बन रहे ताजा समीकरणों और चुनावी माहौल पर विस्तार से जानने के लिए अभी सब्सक्राइब करें...

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