धर्मेंद्र कुमार

दैनिक जागरण, अमर उजाला, नवभारतटाइम्स.कॉम और एनडीटीवीखबर.कॉम के रास्ते पत्रकारिता में पिछले दो दशक से ज्यादा समय से सक्रिय धर्मेंद्र कुमार मीडियाभारती वेब सॉल्युशन्स के प्रमुख हैं।

कोरोना काल में, हालांकि, घरेलू निवेश करने की बात थोड़ी अटपटी तो लगती है लेकिन सतत छोटा निवेश किसी भी घर की अर्थव्यवस्था का एक अहम पहलू है। ऐसे समय में जब आमदनी कम हुई है, नौकरियां छूट रही हैं, फिर भी, छोटे-छोटे निवेशों के जरिए इस प्रक्रिया को कैसे जारी रखा जा सकता है? इसी तरह के कई सवालों पर बात करने के लिए आज हमारे साथ हैं वित्त नियोजक अभिनव गुप्ता। आलेख को पढ़ने और साक्षात्कार के दौरान पूछे गए सवालों पर अपनी राय व्यक्त करने के लिए अभी सब्सक्राइब करें महज एक रुपये में...

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किसान सड़कों पर उतरकर नए कृषि कानून का विरोध कर रहे हैं। लेकिन, ये पंजाब के किसान हैं। यूपी, बिहार, महाराष्ट्र या कर्नाटक के किसान इस तरह का विरोध नहीं कर रहे हैं। क्यों नहीं कर रहे हैं, यह सवाल है। क्या पंजाब के किसान नए कृषि कानूनों को समझ नहीं पा रहे हैं? इसके विपरीत, केंद्र सरकार विरोध कर रहे इन किसानों को क्यों नहीं समझा पा रही है? क्या किसानों की आड़ में नेतागिरी हो रही है? असली समस्या क्या है? इसका हल क्या है? ऐसे ही कई सवालों पर विचार-विमर्श के लिए आज हमारे साथ हैं वरिष्ठ पत्रकार प्रियरंजन झा। पूरा आलेख पढ़ने और साक्षात्कार में भाग लेने के लिए अभी सब्सक्राइब करें, मात्र एक रुपये में...

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यूपी, मध्य प्रदेश और अब हरियाणा में भी सरकारों ने लव जिहाद पर कानून बनाए जाने के संकेत दे दिए हैं। कानून बन भी जाएंगे, लेकिन क्या वाकई लव जिहाद जैसा कुछ है भी या यह बीजेपी के खुराफाती दिमाग की महज उपज मात्र है? हाल ही में कुछ घटनाएं ऐसी भी हुईं जिनमें हिंदू वधू और मुस्लिम वरों के रिश्ते टूटे हैं लेकिन सामाजिक जमीन पर ये घटनाएं लव जिहाद के दायरे में आती भी हैं या नहीं...? साथ ही, क्या अपनी पहचान छुपाकर रिश्ते बनाने के मामलों के पीछे लव जिहाद ही है? ऐसे ही कई सवालों पर बात करने के लिए आज हमारे साथ हैं वरिष्ठ पत्रकार केशव चतुर्वेदी। पूरा आलेख पढ़ने और साक्षात्कार में भाग लेने के लिए अभी सब्सक्राइब करें, मात्र एक रुपये में... 

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बिहार चुनावों के परिणाम हमारे सामने आ चुके हैं... और, जैसे कि पिछले कई बार से एक्जिट पोल के नतीजे लगातार गलत आ रहे हैं, इस बार भी गलत ही साबित हुए। तो, क्या अब वक्त नहीं आ गया है कि एक्जिट पोल की इस ‘बेवकूफाना’ अवधारणा को उठाकर डिब्बे में बंद कर कहीं दूर फेंक दिया जाए…? एक्जिट पोल की प्रासंगिकता और इससे जुड़े कई दूसरे सवालों पर बात करने के लिए आज हमारे साथ हैं मीडिया आलोचक और वरिष्ठ पत्रकार ब्रज खंडेलवाल। आप भी इस साक्षात्कार में हिस्सा ले सकते हैं। पूरा आलेख पढ़ने और साक्षात्कार में पूछे गए सवालों पर अपनी राय व्यक्त करने के लिए महज एक रुपये में अभी सब्सक्राइब करें...

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बिहार चुनावों के परिणाम आ चुके हैं। अब राज्य में राजनीतिक माहौल कैसा रहेगा और उसका एनडीए की राजनीति पर क्या असर पड़ने वाला है? इन सब सवालों पर बातचीत करने के लिए आज हमारे साथ हैं बिहार की जमीन से जुड़े पत्रकार बिपिन तिवारी। आप भी साक्षात्कार में पूछे गए सवालों के जवाब दे सकते हैं। पूरा आलेख पढ़ने और साक्षात्कार में हिस्सा लेने के लिए अभी सब्सक्राइब करें महज एक रुपये में...

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पूरी दुनिया में उत्तर और दक्षिण के बीच श्रेष्ठता को लेकर द्वंद्व की बात की जाती है। मानवीय रंग से जुड़ी संवेदनाएं भी इस संघर्ष में अपनी भूमिकाएं निभाती रही हैं। आदिकाल से चली आ रही यह बहस भारतीय उपमहाद्वीपीय समाज में भी नजर आती है। इस सामाजिक विवाद के स्वरूप और जटिलताओं को समझने के लिए, आज हमारे साथ हैं ह्यूमर टाइम्स की संपादक मुक्ता गुप्ता। पूरा आलेख पढ़ने और साक्षात्कार में शामिल सवालों पर अपनी राय व्यक्त करने के लिए अभी मात्र एक रुपये में सब्सक्राइब करें...

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