दुनिया

शशि थरूर ने ट्रंप के बारे में जो टिप्पणी की, और एप्पल कंपनी को भारत से निकलने की सलाह देकर ट्रंप ने अमेरिका की इमेज को जितना नुकसान किया है वो निक्सन और क्लिंटन के विवादित कार्यकालों से सौ गुना ज्यादा बताया जा रहा है।

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जब भारत चारों ओर से असहज और शत्रुतापूर्ण पड़ोसियों से घिरा है, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या छोटे, संसाधनहीन राष्ट्रों का कोई भविष्य बचा है? या वे हमेशा के लिए वैश्विक ‘बास्केट केस’ बनकर रह जाएंगे। खासकर, वे देश जो गरीबी, राजनीतिक अस्थिरता और बाहरी सहायता पर निर्भरता के दुष्चक्र में फंसे हुए हैं, और कट्टरवाद के टापू बने हुए हैं...

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‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद पाकिस्तान ही नहीं, बल्कि चीन भी घोर निराशा के दलदल में जा फंसा है। इसका प्रमुख कारण पाकिस्तान द्वारा उपयोग में लाए गए चीनी हथियारों की विफलता रहा। ध्यान रहे, पाकिस्तान अपने अधिकतर हथियार चीन से ही आयात करता है।

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अगर भारत ने पाकिस्तान पर अपनी पूरी परमाणु क्षमता का इस्तेमाल करके खुली जंग छेड़ी, तो इसके नतीजे केवल पाकिस्तान के लिए नहीं बल्कि इस पूरे क्षेत्र व पूरी दुनिया के लिए क़यामत से कम नहीं होंगे...

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भारत-पाक तनाव की धधकती पृष्ठभूमि में, पश्चिमी देशों की भारत-विरोधी मानसिकता अब कूटनीतिक मतभेद से कहीं आगे, न्याय और तर्क के साथ सरासर विश्वासघात में तब्दील हो गई है। एक जीवंत लोकतंत्र और दशकों से आतंकवाद का शिकार रहे भारत को पाकिस्तान जैसे राष्ट्र के समकक्ष खड़ा करना – जिसका इतिहास जिहादी तत्वों को पोषित करने का रहा है – एक घोर अन्याय है। यह तटस्थता नहीं, बल्कि शक्ति, पूर्वाग्रह और भारत के तेजी से बढ़ते कद को लेकर पश्चिम की बेचैनी का स्पष्ट प्रदर्शन है...

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प्रारम्भ से ही चीन की विदेश नीति विस्तारवादी प्रकृति की रही है। इसके अनुरूप वह भारत के लद्दाख व पूर्वोत्तर प्रदेशों पर आधिपत्य के लिए अपनी गिद्ध दृष्टि से निरन्तर अवसर की प्रतीक्षा में रहा है...

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