संपादकीय

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अब नहीं हैं। जब हम बहुत छोटे थे तो उनके दस्तखत नोट पर दिखते थे। घर के किसी बड़े ने बताया था कि जिसके दस्तखत नोट पर होते हैं, वह बहुत ‘बड़ा’ आदमी होता है। उसे ‘गवर्नर’ कहते हैं। हम बहुत खुश होते थे कि कभी हम भी ‘गवर्नर’ ही बनेंगे। फिर बैठकर सभी नोटों पर साइन किया करेंगे। खैर! यह बचपन की बात है। जब थोड़े बड़े हुए तो पता चला कि मनमोहन सिंह एक बेहतरीन अर्थशास्त्री हैं। बाद में एक बेहतरीन वित्त मंत्री बने। इंटरनेट पर घूम रहा उनका ‘बायोडाटा’ बताता है कि उनके जैसा आदमी न कभी हुआ है, और न होगा।

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धार्मिक स्थलों पर गतिविधियां और आध्यात्मिक नेताओं की आबादी चिंताजनक रूप से बेतहाशा बढ़ रही हैं। अदालतों में धार्मिक मसलों का अंबार लग गया है...

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बांग्लादेश की घटनाओं के बाद हमें सावधान हो जाना चाहिए। कम्युनिस्ट तो सिस्टम को नहीं तोड़ पाए, लेकिन फंडामेंटलिस्ट मानसिकता वाले तत्व लोकतंत्र को संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों से ही उसको ध्वस्त करने पर आमादा हैं।

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हालिया तीन राज्यों में हुए चुनावों के बहाने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा कार्यकर्ताओं ने बताया है कि ऐसे लड़े जाते हैं चुनाव...

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साल 1947 में स्वतंत्रता मिलने पर बहुत से सेक्युलरवादियों ने सोचा था कि युगों से चला आ रहा विचारधाराओं का संघर्ष, ‘टू नेशन थ्योरी’ के जनक मोहम्मद अली जिन्ना को पाकिस्तान मिलने के बाद समाप्त हो जाएगा। जिन्ना शुरू से ही कहते आए थे कि हिन्दू, मुस्लिम दो अलग राष्ट्र हैं, इसलिए विभाजन ही इस दम घोंटू स्थिति का एकमात्र समाधान है...

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कैसे ये तथ्य नजरअंदाज करें कि आबादी के नियंत्रण से आज भारत की सामाजिक आर्थिक व्यवस्था सुदृढ़ हुई है, मध्यम वर्ग की जीवन शैली तथा शिक्षा स्तर काफी सुधरा है। स्वास्थ्य भी बेहतर हुआ है। साल 1952 में शुरू हुए परिवार नियोजन अभियान का प्रभाव अब दिखने लगा है। ऐसे में जनसंख्या वृद्धि का सुझाव कौन मानेगा?

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