दोपहर की तपती धूप। सड़क किनारे सरकारी पंप। फटे-कपड़ों में एक आदमी, जिसे देखने वाले ‘भिखारी टाइप’ कह सकते हैं, महीनों बाद पानी से बदन भिगो रहा है। तभी एक चमचमाती कार रुकती है। भीतर से उतरी एक संभ्रांत महिला नाक सिकोड़कर कहती है, “देखो, कितना पानी बेकार बहा रहा है!
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