संपादकीय

गांधी परिवार की रणनीति हमेशा यह रही है कि पार्टी का मुखिया कोई ऐसा व्यक्ति हो जो ‘काबू में’ रहे। वर्तमान अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे इस सोच के लिए बिल्कुल मुफ़ीद साबित हुए हैं...

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लहरिया सराय का 40 वर्षीय युवा राम सहाय रेलवे स्टेशन पर आज एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहां उसका हर कदम आगे बढ़ता है तो कोई न कोई ताक़त उसे पीछे खींच लेती है। गांव की मिट्टी की सुगंध, और शहरी चकाचौंध के आकर्षण से जूझता यह शख्स हर भारतीय नागरिक की दुविधा का आईना बन चुका है...

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भारत की राजनीति में विचारधाराएं अब जाति के आगे नतमस्तक हैं। कम्युनिस्ट आंदोलन इतिहास बन चुके हैं, राष्ट्रवाद थका हुआ दिखता है, और धर्म की अफीम भी जातीय दीवारों को ढहाने में असमर्थ रही है। जाति अब भारतीय समाज की आत्मा में गहराई तक समा चुकी है...

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भारत में कुल 2,827 राजनीतिक पार्टियां पंजीकृत हैं, जिनमें छह राष्ट्रीय, 58 राज्य, और 2,763 गैर-मान्यता प्राप्त दल शामिल हैं। यह आंकड़ा चुनाव आयोग की 23 मार्च 2024 की रिपोर्ट का है। इस साल जनवरी में जनसेना को राज्य पार्टी का दर्जा मिलने के बाद इस सूची में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। इतनी पार्टियों के बावजूद सवाल वही है, लोकतंत्र की शुचिता बार-बार क्यों लांछित होती है...

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एक ज़माना था जब विश्वविद्यालयों के कैंपस गूंज उठते थे—"इंकलाब जिंदाबाद!", "हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के!" के नारों से। विश्वविद्यालयों की दीवारें सिर्फ पत्थर नहीं, विचारों की आग से लाल होती थीं। बीएचयू, इलाहाबाद, दिल्ली, लखनऊ—हर कैंपस में बहसें होती थीं, छात्र नेताओं के भाषणों में आग होती थी। आज? सन्नाटा। सिर्फ फुसफुसाहटें। क्या हमारा लोकतंत्र सो गया है?

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नेपाल, बांग्लादेश और कई वर्ष पहले मिस्र में हुए छात्र आंदोलनों ने सत्ता पलट दी। हश्र यह हुआ कि वहां अभी तक लोकतंत्र मजबूती नहीं दिखा सका है। तो, क्या वजह हैं जो भारत, अमेरिका आदि देशों में लोकतंत्र इतना मजबूत है...

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पता नहीं आइपीएस अधिकारियों को ट्रेनिंग के दौरान भीड़ प्रबंधन पढ़ाया जाता है या नहीं, लेकिन बेंगलुरु जैसे हाईटेक सिटी में भगदड़ से हुई मौतों को लेकर पुलिस की कार्यप्रणाली पर कुछ सवाल उठना जायज़ ही नहीं समय की मांग हैं।

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जून में हुए लोकसभा चुनावों में हार के बाद, क्या सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में वांछित राजनीतिक लाभ प्राप्त करते हुए अपने कथानक और रणनीति में सुधार किया है? क्या आने वाले दिल्ली चुनावों में ध्रुवीकरण का नया मंत्र, ‘बटेंगे तो कटेंगे’ और भी धारदार और सटीक होगा, और भाजपा के लिए फायदे का सौदा बनेगा...

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वर्ष 2025 हमें अधिकारों के शोरगुल से ऊपर उठकर कर्तव्य की शांत शक्ति को अपनाने के लिए प्रेरित करता है। आकांक्षाओं से भरे राष्ट्र में, एक सामंजस्यपूर्ण समाज केवल एक सपना नहीं है, बल्कि एक सामूहिक जिम्मेदारी है। इसके लिए, अब अपने फोकस में बदलाव की आवश्यकता है। व्यक्तिगत अधिकारों से साझा दायित्वों की ओर तथा व्यक्तिगत लाभ की खोज से नागरिक गुणों की खेती की ओर चलने का समय आ गया है...

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पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अब नहीं हैं। जब हम बहुत छोटे थे तो उनके दस्तखत नोट पर दिखते थे। घर के किसी बड़े ने बताया था कि जिसके दस्तखत नोट पर होते हैं, वह बहुत ‘बड़ा’ आदमी होता है। उसे ‘गवर्नर’ कहते हैं। हम बहुत खुश होते थे कि कभी हम भी ‘गवर्नर’ ही बनेंगे। फिर बैठकर सभी नोटों पर साइन किया करेंगे। खैर! यह बचपन की बात है। जब थोड़े बड़े हुए तो पता चला कि मनमोहन सिंह एक बेहतरीन अर्थशास्त्री हैं। बाद में एक बेहतरीन वित्त मंत्री बने। इंटरनेट पर घूम रहा उनका ‘बायोडाटा’ बताता है कि उनके जैसा आदमी न कभी हुआ है, और न होगा।

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