संपादकीय

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने हाल ही में एक बुनियादी सच्चाई को दोहराया है, “भारत की तक़दीर उसकी अपनी अंदरूनी ताक़त से तय होगी, दूसरों की मेहरबानी या गलतियों से नहीं। आज की बदलती दुनिया में, उन्होंने एक आत्मनिर्भर भारत पर ज़ोर दिया है, एक ऐसा भारत जो हिंद महासागर को सिर्फ एक रास्ता नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता के लिए एक ज़रूरी हिस्सा मानता है।"

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संसदीय गरिमा पर भाषण देना हमारे जनप्रतिनिधियों का पसंदीदा शगल बन चुका है, लेकिन उसी गरिमा को रोज़मर्रा की राजनीति में रौंद देना उससे भी ज़्यादा सहज हो चुका है। संसद, विधानसभाओं, स्थानीय निकायों, पंचायतों तक, में मर्यादा की दुहाई जितनी ऊंची आवाज़ में दी जाती है, व्यवहार में उसकी अनदेखी उतनी ही बेशर्मी से हो रही है...

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आख़िर हमें इतनी तेज़ रफ्तार किसलिए चाहिए? अगर पहुंचना यमराज के दरबार में ही है, तो फिर एक्सप्रेसवे बनाने पर हज़ारों-करोड़ों रुपये क्यों बहाए जा रहे हैं...

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डोनाल्ड ट्रंप को इतिहास में कभी कोई महान जनरल नहीं मानेगा। लेकिन, जंग की व्याकरण बदलने वालों में उनका नाम जरूर दर्ज होगा। उन्होंने बता दिया है कि अब लड़ाई के लिए बंदूक ज़रूरी नहीं है। न रणभूमि, न धुएं से भरा आसमान, बस टैरिफ़, ट्वीट, धमकी और तमाशा…

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हाल ही में एक ज्ञानी बाबाजी से टकराहट हुई। वह बोले "कलियुग आ चुका है, अमेरिका, यानी पश्चिम, से शुरू हुआ है, फिर मध्य एशिया, अंत में भारतीय क्षेत्र पर सौ साल में छा जाएगा। तब तक आगे बढ़ना है। नीचे गिरने से पूर्व तरक्की की बुलंदियां छूनी होती हैं, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप पश्चिमी समाज को गर्त में पहुंचाने के लिए ही अवतरित हुए हैं।" उनकी बातें सुनकर कुछ लोगों का सोया हास्य रस जाग्रत हुआ...

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भारत की हर वयस्क, गैर-पेंशनभोगी और गैर-आयकरदाता महिला को ₹5,000 मासिक ‘यूनिवर्सल बेसिक सैलरी’ देना न केवल आर्थिक रूप से पूरी तरह संभव है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, लैंगिक समानता और जमीनी विकास के लिए आवश्यक है। यह एक सीधी, सम्मानजनक और भ्रष्टाचार-मुक्त व्यवस्था बनकर उन अनगिनत भारतीय महिलाओं को औपचारिक रूप से “कमाने वाली” की पहचान दे सकती है, जिनके श्रम ने दशकों से परिवार और समाज की रीढ़ तो संभाली, पर उन्हें कभी आर्थिक स्वतंत्रता नहीं मिली...

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