क्षेत्रीय

बीती पहली तारीख की तपती दोपहर में मदुरै की ज़मीन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी सियासी बिजली की तरह उतरे। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले उन्होंने एनडीए में नई जान फूंक दी। विकास, भक्ति और तीखे बयान, तीनों का ज़बर्दस्त संगम दिखा। मकसद साफ था। डीएमके के लंबे क़ब्ज़े को चुनौती देना...

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उत्तर-पूर्वी भारत की ऊंची पहाड़ियों और घाटियों में एक शांत क्रांति हो रही है। यहां बदलाव बड़े-बड़े ऐलान के साथ नहीं आता बल्कि, यह अलग-अलग कूड़ेदानों की हल्की खड़खड़ाहट, गांव द्वारा चलाए जा रहे रीसाइक्लिंग यूनिट की धीमी आवाज़, और उन नागरिकों के पक्के कदमों से आता है जो अपनी ज़मीन को कचरे में डूबने नहीं देना चाहते...

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क्या उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था योगी आदित्यनाथ के शासन में वाकई में सुधरी है, या शांति सिर्फ बंदूक की नोक पर थोप दी गई है...

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केरल, जिसे लंबे समय से कम्युनिस्टों का गढ़ माना जाता रहा है, जहां कभी कमल को मज़ाक में उगने वाली घास कहा जाता था, आज हर जगह चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन गया है। हाल ही में, तिरुवनंतपुरम में, अमित शाह की ज़ोरदार मौजूदगी, और उनका वक्तव्य, कोई साधारण भाषण नहीं था, बल्कि 2026 के लिए साफ़ चुनावी संदेश था। कल्पना कीजिए, लाल झंडों के बीच कमल खिलते हुए। यह सपना नहीं, एक नई राजनीतिक कोशिश है।

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शाम की सैर, ठंडी हवा, एक मासूम-सा मज़ाक, और अचानक एक कड़वी सच्चाई सामने आ गई। पार्क की पगडंडी पर टहलते हुए मेरी मुलाक़ात हमारे बेहद तहज़ीबदार बंगाली बैंक मैनेजर, चटर्जी बाबू से हो गई। हल्के-फुल्के अंदाज़ में पूछ लिया, “तो चटर्जी बाबू, 1 अप्रैल को रिटायरमेंट के बाद कोलकाता की ट्रेन पकड़ रहे हैं?”

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अमित शाह की कथित ‘मास्टरस्ट्रोक’ राजनीति ने बिहार में झंडा गाड़ दिया, अब सवाल यह है कि क्या वही हिंदुत्व की आंधी तमिलनाडु के द्रविड़ दुर्ग की मोटी दीवारों में दरार डाल पाएगी? या यह किला, हर बार की तरह, बाहरी हमलों को ठंडे आत्मविश्वास से झेल लेगा...

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