ऐसा सुना है कि जहां शिक्षा और सम्पनता होती है वहां अंधविश्वासों का बोलबाला नहीं होता लेकिन मेलबर्न में बच्चे और बूढ़ों को 'हैलोवीन' का त्यौहार मनाते देखा तो यह भ्रम उड़नछू हो गया। यहां हर साल 31 अक्टूबर को मनाए जाने वाले इस त्यौहार में बच्चे भूत, प्रेत और चुड़ैल के रूप रख घर-घर जाते हैं और घर की मालकिन से कहते है कि 'बोलो जादू-टोना करें कि कुछ खिलाती हो?' मालकिन झट से चॉकलेट - टाफियां निकालकर घर में घुस आए सभी 'भूत-प्रेतों' को देती है और बच्चे दूसरे घर की और रुख करते हैं और इस प्रकार सारे मोहल्ले की एक शाम मौज-मस्ती में गुजरती है। इस खेल का लुफ्त मैंने नजदीक से लिया। मुझे याद आई अपने मोहल्ले की, जब दशहरा पर बच्चे टेसू - झांझी लेकर घर-घर जाते हैं और कहते हैं- 'मेरा टेसू अड़ा-खड़ा, खाने को मांगे दही-बड़ा'। विज्ञान के लिए सदैव से चुनौती रहे भूत-प्रेत विशाल पृथ्वी पर सब जगह हैं। जहां इंसान है वहां भूत-प्रेत हैं। हां, एक अंतर है... हमारे यहां भूत-प्रेत धंधे में भी घुस गए है जबकि यहां अभी मनोरंजन तक ही सीमित हैं। गोरों का 'हैलोवीन' त्यौहार दो हज़ार साल पुराना है। किसी भी युग में भूत-प्रेत गायब नहीं हुए। सब जगह समय-समय पर इनकी चर्चा होती रही और घुरन्धर लेखकों, साहित्यकारों के मन में भी समाए रहे। विलियम शेक्सपियर (1565-1616) के नाटक 'मैकबेथ' में नाटक की शुरुआत तीन भूतनी की उपस्थिति से होती है। दूसरे नाटक 'हेमलेट' में भूत का जबरदस्त रोल है। मथुरा के केआर महाविद्यालय के स्व. प्रोफ़ेसर व हिंदी कवि तपेश चतुर्वेदी अपनी बातचीत में भूतों के अद्भुत किस्से सुनाकर रहस्य-रोमांच पैदा करने में माहिर थे। उनके भूत सफ़ेद कपड़े पहनते थे और पैर उलटे होते थे। उनके किस्सों से मनोरंजन कम, दहशत ज्यादा पैदा होती थी। मेरे और आपके पास अपने-अपने भूतों के अलग-अलग किस्से जरूर होंगे...
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