आप मेलबर्न (ऑस्ट्रलिया) आएं और नेड केली की रोचक कहानी सुने बिना चले जाएं, यह संभव नहीं...। अंग्रेजी हुकूमत को ललकारने वाले 25 साल के आयरिश नौजवान नेड केली को सन 1880 में अंग्रेजी हुकूमत ने फांसी पर लटका दिया था।
मेलबर्न की ओल्ड जेल (आज म्यूजियम) की काल कोठरी और उस स्थान को देखकर हैरत होती है जहां नेड को आनन-फानन में फांसी दी गई। ऑस्ट्रेलिया के मंझे हुए कलाकारों द्वारा एक घंटे के नाटक का मंचन देखकर कोई भी मंत्रमुग्ध हो जाएगा। यह नाटक नेड की जिन्दगी पर फांसी स्थल पर होता है। मजेदार बात यह है कि नेड की जिन्दगी में जिसने भी जाने की कोशिश की, वह बहता ही चला गया। इतिहासकार, शिक्षाविद, समाज सुधारक, उपन्यासकार, फिल्म निर्माता, कवि, लेखक, पत्रकार, लोकगायक ही नहीं, ऑस्ट्रेलिया की सामान्य जनता ने भी नेड के गीत गए हैं।
ऑस्ट्रेलिया की पुलिस रहस्य-रोमांच से भरपूर नेड की जिन्दगी के कुछ अनसुलझे पहलुओं को आज भी सुलझाने की कोशिश करती रहती है।
जून 1855 में जन्मे नेड के पिता रेड केली आयरलैंड से एक कैदी के रूप में ऑस्ट्रेलिया लाए गए थे। सजा काटने के बाद केली परिवार यहीं बस गया। 12 भाई-बहिनों में नेड सबसे बड़ा था। 12 वर्ष की उम्र में नेड ने देखा कि विक्टोरिया पुलिस ने उसके परिवार को कभी भी चैन की सांस नहीं लेने दी। अबोध बच्चों के साथ उसकी मां को तो जब-कभी जेल में डाल देना पुलिस की आदत बन गई। 14 वर्ष की उम्र में नेड बागी हो गया। चार हमउम्र दोस्तों के साथ मिलकर वह अंग्रेजी हुकूमत को मजा चखाने के लिए बगावत की राह पर चलने लगा। हथियार थाम और घोड़ों पर सवार चार नौजवानों का केली गैंग जब जंगलों से अत्याचारी सत्ता के खिलाफ हुंकार भरता था तो पुलिसवालों की रूह कांप जाती थी। केली गैंग को पैसों की जब भी आवशयकता होती वे बैंक लूटते, किसी राहगीर को नहीं। सन 1878 तक केली के नाम से सरकार थर-थर कांपने लगी। 100 पाउंड का इनाम रखा गया केली के सिर पर। एक बार चार पुलिसवालों ने केली को घेर लिया। इनमें तीन पुलिसवाले गैंग की गोलियों से मारे गए। एक भाग निकला। इस घटना के बाद केली की गिरफ्तारी पर इनाम 200 पाउंड कर दिया गया। बाद में यह इनाम 8000 पाउंड तक पहुच गया। इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया में किसी अपराधी को पकड़ने के लिए इतना बड़ा इनाम पहले कभी घोषित नहीं किया गया था।
केली गैंग के चारों सदस्य लोहे का कवच पहनते थे। इसपर गोली असर नहीं करती थी। इस कवच में खेत जोतने वाले हल का लोहा प्रयोग में लाया जाता था। सिर से लेकर पैरों तक का 40 किलो वजन का कवच किस तकनीक से बनाया गया...? केली के दिमाग में कवच की परिकल्पना कैसे आई...? और, इसे कैसे अंजाम दिया गया? आदि... सवाल 130 साल बाद भी केली पर शोध करने वालों को परेशान किए हुए हैं। गांव वाले केली से भरपूर सहानभूति रखते थे। केली ने 57 पेज (करीब 8000 शब्द) का एक पत्र लिखा और इसे अखबार में प्रकाशित करने के लिए एक व्यक्ति को दिया। इसकी एक प्रति विक्टोरिया संसद को भेजी गई। इस पत्र को तब दबा दिया गया था लेकिन साल 1930 में यानी केली को मृत्युदंड दिए जाने के 50 साल बाद यह पत्र उजागर हुआ। इस पत्र में केली ने अपने बागी बनने की पूरी कथा तथा अपने परिवार पर किए गए पुलिसिया जुल्मों के बारे में लिखने के साथ-साथ शोषित और गरीबों पर ब्रिटिश हुकूमत द्वारा किए जाने वाले अन्याय की तस्वीर पेश की है।
यह एक संयोग ही है कि केली के इस पत्र और भारत के शहीद भगत सिंह द्वारा अदालत में दिए गए बयानों में समानता मिलती है। केली ने पुलिस के हाथों कभी न पकड़े जाने की व्यवस्था अपने कवच के माध्यम से कर रखी थी लेकिन विधि को यह मंजूर न था। 26 जून 1880 को मेलबर्न से 180 किमी दूर ग्लेंरोवन नाम का गांव है। केली ने इस गांव के 70 लोगों को अचानक बंधक बनाया। उसकी योजना थी कि इस खबर को सुन मेलबर्न से पुलिस फोर्स ट्रेन से आएगी। वह रास्ते में पटरी उखाड़कर ट्रेन को पलटने की व्यवस्था कर देगा। बंधकों में एक स्कूल मास्टर भी था। किसी तरह वह भाग निकला और पुलिस को खबर कर दी। पुलिस ने उस होटल को घेर लिया जिसमें केली बंधकों के साथ था। दोनों ओर से गोलीबारी हुई। केली अपने कवच पर गोलियों के वार झेलता रहा लेकिन एक गोली उसके पैर में लगी और वह गिर पड़ा और पकड़ा गया। बाकी तीन साथी मारे गए। मुकदमा चला और आनन-फानन में 11 नवंबर 1880 को केली को ओल्ड जेल में फांसी पर लटका दिया गया। केली को फांसी न देने की अपील 30 हजार गांववालों ने की। फांसी की सजा सुनाने वाले जज रेडमंड बेरी ने जब केली से अंतिम इच्छा पूछी तो केली ने बड़ी सहजता से कहा कि वह जहां जा रहा है वहां आपसे (जज) जल्द ही मुलाक़ात होगी। यह भी एक अजब संयोग ही था कि जज बेरी 12 दिन बाद अपने चैंबर में चल बसे।
केली की कहानी का एक आश्चर्यजनक पहलू यह है कि जज बेरी ने ओल्ड जेल के पास एक लाइब्रेरी की स्थापना की थी। आज यह लाइब्रेरी दुनिया की जानी-मानी लाइब्रेरी है। इस स्टेट लाइब्रेरी में आज केली की स्मृति रक्षा बहुत सम्मान के साथ की जा रही है। एक गेलरी केली को समर्पित है। इसमें केली का रक्षा कवच और केली को अमरत्व प्रदान करने वाला उसका पत्र अनेक चित्रों के साथ बड़े सम्मान के साथ प्रदर्शित है। केली की बहादुरी ब्रिटिश सत्ता को जबरदस्त चुनौती थी। केली किस मिटटी का बना था, इस रहस्य को जानने के लिए पुलिसवालों ने फांसी के फंदे से केली के मृत शरीर को उतारा और उसका सिर कलम कर चिकित्सकों से जांच कराई कि केली के मस्तिष्क में कोई विशिष्ट चीज तो नहीं थी। बाद में पुलिस अफसर केली की खोपड़ी का इस्तेमाल अपनी मेज पर एक पेपरवेट के रूप में भी करते रहे।
अपनी निजी लड़ाई जब जनता की लड़ाई बन जाए तो लड़ने वाला योद्धा जननायक बन जाता है। यही हुआ केली के साथ। जिस स्थान पर केली को फांसी दी गई उस स्थान पर उसके जीवन पर आधारित नाटक खेले जाते हैं। जिस काल कोठरी में वह बंद रहा वह स्थान आज संग्रहालय है। जिस मिटटी में उसने पुलिस के साथ लुकाछिपी की वहां लोकगायक उसकी बहादुरी के गीत गा रहे हैं। सम्पूर्ण ऑस्ट्रेलिया के विश्वविद्यालयों में केली के संघर्ष के पीछे छिपे जनहित के मर्म को तलाशने की कोशिश की जा रही है। केली के जाने के सवा सौ साल बाद भी गोष्ठियों और सेमीनार के जरिये उसके विचारों पर अन्वेषण किया जा रहा है। नेड केली पर करीब छह फ़िल्में भी बनी हैं।
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